पानी जो जीवन का आधार है अब दो राज्यों के बीच एक बड़े आर्थिक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है। भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने राजस्थान से ₹1.44 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि “जल रॉयल्टी” के रूप में मांगकर एक ऐसे मुद्दे को फिर से जीवित कर दिया है, जिसकी जड़ें लगभग एक सदी पुरानी हैं। यह विवाद न केवल इतिहास के पन्नों से निकलकर वर्तमान राजनीति में आया है, बल्कि आने वाले समय में एक बड़े कानूनी संघर्ष का रूप भी ले सकता है।


क्या है पूरा मामला?

पंजाब सरकार का दावा है कि राजस्थान पिछले कई दशकों से बिना किसी भुगतान के पंजाब के जल संसाधनों का उपयोग कर रहा है। यह पानी मुख्य रूप से सतलुज नदी से नहरों जैसे कि फिरोजपुर फीडर के माध्यम से राजस्थान तक पहुंचाया जाता रहा है। राज्य सरकार के अनुसार, वर्ष 1960 से लेकर 2026 तक के उपयोग का हिसाब लगाकर यह बकाया राशि ₹1.44 लाख करोड़ तक पहुंचती है।

इस विवाद की नींव 1920 के दशक में रखी गई थी, जब बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह और तत्कालीन अविभाजित पंजाब के बीच एक व्यावसायिक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत बीकानेर को सतलुज नदी से पानी आपूर्ति के बदले भुगतान करना था। यह व्यवस्था 1960 तक जारी रही, जिसके बाद भुगतान बंद हो गया।


इंडस वाटर्स ट्रीटी 1960 और बदलती व्यवस्था:

Indus Waters Treaty के बाद स्थिति में बड़ा बदलाव आया। इस संधि के तहत भारत को सतलुज, ब्यास और रावी नदियों के जल पर पूर्ण अधिकार मिला। इसके परिणामस्वरूप, जल बंटवारा एक “व्यावसायिक सौदे” से हटकर “अंतर-राज्यीय आवंटन” में बदल गया और राजस्थान ने भुगतान बंद कर दिया।

1981 का त्रिपक्षीय समझौता और जल बंटवारा:

1981 में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का समर्थन प्राप्त था।

इस समझौते के तहत:

  • कुल 17.17 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी में से
  • 8.6 MAF पानी राजस्थान को आवंटित किया गया
  • यह हिस्सा सबसे बड़ा था, जबकि राजस्थान एक गैर-तटीय (non-riparian) राज्य है

इस आवंटन ने इंदिरा गांधी नहर परियोजना के विस्तार को भी मजबूती दी।


2004 में पंजाब सरकार ने Punjab Termination of Agreements Act पारित कर जल बंटवारे के समझौतों को समाप्त करने की कोशिश की। हालांकि, इसमें पहले से चल रहे जल उपयोग को प्रभावित नहीं किया गया, जिससे राजस्थान को पानी मिलता रहा। लेकिन 2016 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने स्पष्ट कर दिया कि कोई भी राज्य एकतरफा अंतर-राज्यीय समझौतों को समाप्त नहीं कर सकता। इस फैसले ने पुराने कानूनी ढांचे को फिर से प्रभावी बना दिया।


राजस्थान सरकार ने पंजाब की ₹1.44 लाख करोड़ की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। राज्य का तर्क है कि:

  • 1920 का समझौता ब्रिटिश शासन के साथ था, आधुनिक पंजाब के साथ नहीं
  • 1955, 1959 और 1981 के समझौतों में “रॉयल्टी” का कोई प्रावधान नहीं है

इसलिए यह मांग असंवैधानिक और कानूनी रूप से अमान्य है

पंजाब सरकार ने संकेत दिया है कि यदि बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो वह इस मामले को अदालत में ले जाएगी। ऐसे में यह विवाद एक बड़े अंतर-राज्यीय कानूनी संघर्ष में बदल सकता है, जिसका असर देश की जल नीति और संघीय ढांचे पर भी पड़ सकता है।


क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे जल विवाद?

भारत में बढ़ते जल संकट ने राज्यों के बीच टकराव को और तीव्र कर दिया है। इसके पीछे कई कारण हैं:

  • जल संकट में वृद्धि: प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 में 5200 घन मीटर से घटकर 2024 में लगभग 1400–1500 घन मीटर रह गई है
  • कृषि में पानी की अधिक मांग: पंजाब जैसे राज्यों में धान जैसी फसलों के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन
  • संवैधानिक टकराव: जल राज्य सूची में है, जबकि अंतर-राज्यीय नदियां केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आती हैं जिससे अधिकारों को लेकर विवाद बढ़ते हैं


पंजाब और राजस्थान के बीच यह जल विवाद केवल पैसों का नहीं, बल्कि संसाधनों, अधिकारों और इतिहास की व्याख्या का प्रश्न बन चुका है। जैसे-जैसे पानी की उपलब्धता घटती जा रही है, वैसे-वैसे ऐसे विवादों के और गहराने की आशंका भी बढ़ रही है। आने वाले समय में यह मामला न केवल अदालतों में, बल्कि देश की जल नीति और संघीय संतुलन के लिए भी एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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