'होलोकॉस्ट डे' के 36 साल: क्या था कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर राजनीतिक दलों का दोहरा चेहरा
कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन को 36 वर्ष पूरे हो गए। 1990 में हुए विस्थापन, हत्याओं के अनुमान, सरकारी कदमों, राजनीतिक विवादों और आज भी लंबित न्याय व पुनर्वास के सवालों पर आधारित विस्तृत रिपोर्ट।

होलोकॉस्ट डे 1990
19 जनवरी 1990—भारतीय इतिहास की वह तारीख जिसने कश्मीर घाटी की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को स्थायी रूप से बदल दिया। ठीक 36 वर्ष पहले, बढ़ती इस्लामी आतंकवादी हिंसा, लक्षित हत्याओं और मस्जिदों से प्रसारित धमकियों के बीच कश्मीर घाटी में रहने वाला लगभग पूरा कश्मीरी पंडित समुदाय अपने घर-बार छोड़ने को मजबूर हो गया। यह पलायन अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों से पनप रही असुरक्षा और भय का चरम बिंदु था।
1989 से ही कश्मीर में उग्रवाद ने संगठित रूप लेना शुरू कर दिया था। पंडित समुदाय के प्रमुख नागरिकों, बुद्धिजीवियों और सरकारी कर्मचारियों की लक्षित हत्याओं ने घाटी में डर का माहौल बना दिया। जनवरी 1990 की सर्द रातों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से खुलेआम धमकियां दी गईं, जिनमें पंडितों को कश्मीर छोड़ने या परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई। इसके बाद कुछ ही दिनों में अनुमानित 1.2 से 1.7 लाख कश्मीरी पंडित अपने पुश्तैनी घरों को छोड़कर जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में शरणार्थी बन गए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1989 से 2004 के बीच 219 कश्मीरी पंडितों की हत्या दर्ज की गई, जबकि समुदाय संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। महिलाओं के साथ बलात्कार, अपहरण और संपत्तियों के जबरन कब्जे की घटनाएं भी सामने आईं, हालांकि विस्थापन और डर के कारण कई मामलों की कभी औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। इन घटनाओं ने समुदाय की सामूहिक स्मृति पर गहरे घाव छोड़े।
विस्थापन के बाद हजारों परिवारों को जम्मू के अस्थायी शिविरों में वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में रहना पड़ा। भीषण गर्मी, सीमित संसाधन, बेरोजगारी और पहचान के संकट ने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। बच्चों की शिक्षा, युवाओं का भविष्य और बुजुर्गों का सम्मान—सब कुछ इस त्रासदी की भेंट चढ़ गया।
2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए नौकरियों, आवासीय कॉलोनियों और सुरक्षा उपायों की घोषणा की। कुछ योजनाएं ज़मीन पर उतरीं, लेकिन सुरक्षा चिंताओं और लक्षित हमलों की आशंकाओं के चलते घाटी में स्थायी वापसी अब भी सीमित रही है। हाल के वर्षों में सरकारी कर्मचारियों पर हुए हमलों ने इन आशंकाओं को और गहरा किया।
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी तीखी बहस होती रही है। जहां एक पक्ष इसे स्पष्ट रूप से नरसंहार मानता है, वहीं कुछ वामपंथी और वैचारिक समूह इस शब्दावली को स्वीकार करने से इनकार करते रहे हैं, जिससे पीड़ित समुदाय में उपेक्षा और असंतोष की भावना और प्रबल हुई है। संसद से लेकर सड़कों तक, न्याय, मान्यता और सुरक्षित वापसी की मांगें बार-बार उठती रही हैं।
आज, 36वीं बरसी पर, कश्मीरी पंडित समुदाय देशभर में श्रद्धांजलि सभाओं, कैंडल मार्च और मौन व्रत के माध्यम से अपने मृतकों को याद कर रहा है। यह दिन केवल अतीत की पीड़ा को स्मरण करने का नहीं, बल्कि यह सवाल दोहराने का भी है कि क्या लोकतंत्र में विस्थापित नागरिकों को अब तक पूर्ण न्याय मिला है। कश्मीरी पंडितों का यह इतिहास आज भी भारत की सामूहिक चेतना और नीतिगत विमर्श के लिए उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
