कौन थे बप्पा रावल? मेवाड़ के वो प्रतापी शासक जिन्होंने अरबों को खदेड़कर गजनी तक फहराया था भगवा ध्वज
गुहिल राजवंश के वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल का जीवन परिचय, अरब आक्रांताओं पर उनकी ऐतिहासिक जीत और रावलपिंडी शहर से उनका विशेष संबंध।

भारत की पावन धरा पर जब-जब विदेशी आक्रांताओं की काली छाया मंडराई, तब-तब इतिहास के गर्भ से ऐसे नायकों का जन्म हुआ जिन्होंने अपनी वीरता से युगों तक के लिए स्वाभिमान की गाथा लिख दी। भारतीय शौर्य के ऐसे ही एक शिखर पुरुष थे बप्पा रावल, जिन्हें मेवाड़ के गुहिल राजवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वर्ष 712 ईस्वी में ईडर के राजा महेंद्र द्वितीय के घर जन्मे बप्पा रावल का मूल नाम 'कालभोज' था, किंतु उनकी लोक-कल्याणकारी छवि और राष्ट्र रक्षा के प्रति अटूट समर्पण के कारण जनता ने उन्हें 'बप्पा' जैसी सम्मानजनक उपाधि से नवाजा, जो कालांतर में उनके व्यक्तित्व का पर्याय बन गई। उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षों और विडंबनाओं के बीच बीता, जहाँ मात्र तीन वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें अपनी माता के साथ असहाय स्थिति का सामना करना पड़ा, लेकिन संकट की उस घड़ी में भील समुदाय ने उन्हें न केवल संरक्षण दिया बल्कि उनके भीतर अदम्य साहस का संचार भी किया। भील जनजाति के बीच पले-बढ़े बप्पा के व्यक्तित्व में इस साहचर्य ने अद्भुत सैन्य कौशल और नेतृत्व क्षमता विकसित की, जिसका प्रमाण आगे चलकर अरबों के विरुद्ध हुए भीषण युद्धों में देखने को मिला।
बप्पा रावल के जीवन में आध्यात्मिक गुरु हारित ऋषि का आगमन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन ने उन्हें धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रेरित किया। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, हारित ऋषि के माध्यम से ही उन्हें भगवान शिव के दर्शन प्राप्त हुए और गुरु गोरखनाथ की कृपा से एक ऐसी चमत्कारिक तलवार मिली, जिसने शत्रुओं के विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। 734 ईस्वी में मात्र 20 वर्ष की आयु में बप्पा रावल ने चित्तौड़ के तत्कालीन मौर्य शासक मानमोरी को पराजित कर अभेद्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। यह वह कालखंड था जब मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद अरब सेनाएं मारवाड़, मालवा और गुजरात की सीमाओं को लांघकर भारत के अंतर्मन को छलनी करने का प्रयास कर रही थीं। बप्पा रावल ने गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट्ट प्रथम के साथ मिलकर उन विदेशी आक्रांताओं को न केवल मेवाड़ से बाहर खदेड़ा, बल्कि वर्तमान कराची (तत्कालीन ब्राह्मणवाद) को अपना सैन्य केंद्र बनाकर सिंध तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उनकी वीरता का डंका इस कदर बजा कि उन्होंने गजनी के शासक सलीम को परास्त कर अपने भतीजे को वहाँ का शासन सौंप दिया, और माना जाता है कि पाकिस्तान का प्रसिद्ध शहर 'रावलपिंडी' आज भी उनके नाम की गौरवशाली स्मृति को संजोए हुए है।
बप्पा रावल केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और परम शिव भक्त भी थे, जिसका प्रमाण उनके द्वारा जारी किए गए सोने के सिक्कों और वास्तुकला से मिलता है। उनके द्वारा बनवाए गए सिक्कों पर त्रिशूल, शिवलिंग, नंदी और गौ-माता के प्रतीकों का होना उनके धार्मिक अनुराग और आर्थिक समृद्धि को दर्शाता है। उन्होंने ही उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में भगवान एकलिंगजी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी मेवाड़ राजवंश के आराध्य देव के रूप में पूजे जाते हैं। नागदा को अपनी राजधानी बनाकर उन्होंने एक ऐसे सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी, जिसकी शाखाओं से आगे चलकर राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे अपराजेय योद्धा निकले। उनके शासन के 19 वर्षों के दौरान मेवाड़ ने न केवल राजनीतिक अखंडता प्राप्त की, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक गौरव को भी पुनः स्थापित किया। 753 ईस्वी में अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर रहते हुए उन्होंने मात्र 39 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर लिया, जो उनके विरक्त और महान व्यक्तित्व का परिचायक था।
बप्पा रावल का निधन नागदा में हुआ, जहाँ आज भी उनकी समाधि भारतीय वीरता के उस स्वर्णिम अध्याय की गवाही देती है। कुंभलगढ़ प्रशस्ति और आबू के अभिलेखों में उनकी वंशावली और कीर्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो उन्हें भारतीय इतिहास के एक अमिट नायक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। विदेशी आक्रमणकारियों को भारत की सीमाओं से कोसों दूर खदेड़ने वाले और मेवाड़ के गौरवशाली 'सिसौदिया वंश' की आधारशिला रखने वाले बप्पा रावल का इतिहास केवल विजयों का वृत्तांत नहीं है, बल्कि यह उस अटूट संकल्प की कथा है जिसने आने वाली कई शताब्दियों तक भारत के मान-मर्यादा की रक्षा की। उनका जीवन संदेश देता है कि जब धर्म और राष्ट्र पर विपत्ति आती है, तो एक सच्चा नायक अपने पराक्रम से भूगोल और इतिहास दोनों को बदलने की शक्ति रखता है। आज भी मेवाड़ की मिट्टी और वहाँ के जनमानस में बप्पा रावल एक जीवित किंवदंती के रूप में विद्यमान हैं, जिनका नाम लेते ही प्रत्येक भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है।

