मंत्रोच्चार, शंखनाद और साधु-महंतों की उपस्थिति के बीच त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभमेले का मंगलारंभ हुआ। पवित्र कुशावर्त तीर्थ पर गोदावरी के सान्निध्य में आयोजित भव्य धार्मिक समारोह में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने धर्मध्वज फहराया। इस अवसर पर शृंगेरीपीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती भी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। विधिवत पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद धर्मध्वजारोहण के साथ सिंहस्थ कुंभमेले के पर्व का शुभारंभ हुआ।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार सुबह कुशावर्त तीर्थ पहुंचकर समारोह में भाग लिया। यहां उनके हाथों उपस्थित साधु-महंतों का स्वागत किया गया। इसके बाद शृंगेरीपीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती का भी स्वागत किया गया।

समारोह की शुरुआत पवित्र गोदावरी नदी के विधिवत पूजन से हुई। पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के साथ गोदावरी की स्तुति की। इसके बाद संकल्प विधि संपन्न कराई गई। इस दौरान सभी प्राणियों के सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना करते हुए प्रार्थना की गई।

पूजा-विधि का प्रारंभ गणेश पूजन के साथ हुआ। सिंहस्थ कुंभमेले के सभी धार्मिक अनुष्ठान और आयोजन निर्विघ्न संपन्न हों, इसके लिए भगवान गणेश का आह्वान किया गया। पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के माध्यम से देवताओं का आवाहन किया और धर्मध्वजारोहण के लिए देवताओं से अनुज्ञा मांगी। गोदावरी गंगा प्रार्थना और सामूहिक प्रार्थना के दौरान पूरा परिसर भक्तिमय हो गया।

इसके बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ध्वजस्तंभ का पूजन किया। धर्मध्वज और ध्वजपताका की भी विधिवत पूजा-अर्चना की गई। जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती ने भी धर्मध्वज का पूजन किया।

सिंहस्थ कुंभमेले की ज्योतिषीय परंपरा में बृहस्पति का सिंह राशि में प्रवेश महत्वपूर्ण योग माना जाता है। इसी धार्मिक मान्यता के तहत धर्मध्वजारोहण का विशेष महत्व है। धर्मध्वज फहराने के साथ ही सिंहस्थ पर्व का प्रारंभ होता है। इसे सिंहस्थ की पौराणिक परंपरा, गोदावरी की पवित्रता और धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।

सिंहस्थ धर्मध्वज पर अंकित विभिन्न धार्मिक और ज्योतिषीय प्रतीकों का भी विशेष महत्व है। इस ध्वज पर सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति, सिंह, मगर, ॐकार, स्वस्तिक और घंटा सहित कई शुभचिह्न शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक प्रतीक के पीछे धार्मिक आस्था और पौराणिक संदर्भ जुड़े हुए हैं।

सूर्य और चंद्रमा के प्रतीकों को अमृतकुंभ की रक्षा से संबंधित माना जाता है, जबकि बृहस्पति और सिंह के प्रतीक सिंहस्थ की ज्योतिषीय कालगणना से जुड़े हैं। मगर को गोदावरी की तीर्थ परंपरा का प्रतीक माना गया है। वहीं, ॐकार और स्वस्तिक के चिह्न आध्यात्मिकता, मांगल्य और कल्याण का संदेश देते हैं। धर्मध्वज पर अंकित बारह घंटियों, दस दिशाओं और 'ह्रीं' बीजाक्षर का भी विशेष धार्मिक एवं प्रतीकात्मक महत्व है।

इन सभी प्रतीकों से सुसज्जित धर्मध्वज सिंहस्थ कुंभमेले की प्राचीन परंपरा के साथ त्र्यंबकेश्वर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को भी प्रदर्शित करता है।

धर्मध्वज पूजन के बाद शंखनाद के साथ ध्वज की आरती की गई। इसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने धर्मध्वज की परिक्रमा की। इस दौरान भगवान त्र्यंबकेश्वर से प्रार्थना भी की गई।

पुरोहितों के मंत्रोच्चार, शंखनाद और धार्मिक जयघोष के बीच धर्मध्वजारोहण का समारोह उत्साहपूर्ण और मंगलमय वातावरण में संपन्न हुआ। इस पवित्र आयोजन में उपस्थित साधु-महंतों और श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर समारोह का अनुभव किया।

धर्मध्वजारोहण के बाद पवित्र गोदावरी नदी की आरती की गई। त्र्यंबकेश्वर की धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखने वाले इस समारोह के साथ सिंहस्थ कुंभमेले के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वैभव का विधिवत शुभारंभ हुआ।

Pratahkal Newsroom

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