बालासाहेब ठाकरे—एक ऐसा नाम जो दशकों तक मुंबई की पहचान और उसकी धड़कन रहा। नवंबर 2012 में उनके निधन के बाद भी, उनकी छाया शहर की राजनीति पर गहराई से मंडराती है। यह सवाल पूछना कि "क्या मुंबई उन्हें डराएगी," शाब्दिक अर्थ में बेमानी लग सकता है, क्योंकि बालासाहेब अपनी निडरता के लिए विख्यात थे। सच तो यह है कि दशकों तक मुंबई उनसे डरती थी। वे शहर के 'बेताज बादशाह' थे, जिनके एक फोन कॉल पर देश की आर्थिक राजधानी थम जाती थी।

हालाँकि, यदि इस प्रश्न को लाक्षणिक रूप में देखा जाए—यह पूछते हुए कि "आज के मुंबई के कौन से पहलू बालासाहेब ठाकरे की विरासत को चुनौती देते हैं या उन्हें विचलित करते?"—तो एक बिल्कुल अलग और जटिल तस्वीर उभरती है। शहर के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं जो उन सभी सिद्धांतों के विपरीत हैं जिनके लिए वे खड़े थे।

बालासाहेब ठाकरे: एक परिचय
आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली और ध्रुवीकरण करने वाले शख्सियतों में से एक, बाल ठाकरे ने एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरुआत की और शिवसेना के संस्थापक और सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे। उनकी सत्ता मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी थी: 'मराठी मानूस' (भूमिपुत्र) का एजेंडा, कट्टर हिंदुत्व, और नियंत्रण की राजनीति। उन्होंने कभी कोई आधिकारिक सरकारी पद नहीं संभाला, बल्कि उपनगरीय मुंबई स्थित अपने आवास 'मातोश्री' से 'रिमोट कंट्रोल' के जरिए सत्ता चलाई। 1970 से 90 के दशक तक, मुंबई में बालासाहेब का शब्द ही कानून था और उनकी ताकत हजारों वफादार शिवसैनिकों की फौज थी।

आधुनिक मुंबई और बालासाहेब की विरासत के लिए चुनौतियाँ
यदि आज बालासाहेब ठाकरे मुंबई को देखते, तो वे शायद किसी शारीरिक खतरे से नहीं, बल्कि अपनी बनाई नींव को ढहते देखकर सिहर उठते। शहर का विकास उन तरीकों से हुआ है जो उनकी मूल विचारधाराओं को सीधी चुनौती देते हैं। आधुनिक मुंबई उनकी विरासत के लिए निम्नलिखित कारणों से एक 'दुस्वप्न' साबित हो सकती थी:

  • शिवसेना का विखंडन: बालासाहेब के लिए सबसे बड़ा आघात उनकी स्थापित पार्टी की वर्तमान स्थिति होती। उनका दौर एक अखंड शिवसेना का था, जहां उनका आदेश अंतिम होता था और असहमति से सख्ती से निपटा जाता था। आज का मुंबई एक खंडित शिवसेना का गवाह है। पहले उनके भतीजे राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाई। हाल ही में, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए एक बड़े विद्रोह ने पार्टी को बीच से तोड़ दिया, जिससे बालासाहेब के बेटे उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई। चुनाव आयोग द्वारा मूल पार्टी का नाम और प्रतिष्ठित 'तीर-कमान' चुनाव चिन्ह विद्रोही गुट (शिंदे) को दिया जाना, उनकी विरासत के लिए एक बड़ा झटका होता।
  • विचारधारा का कमजोर होना और अकल्पनीय गठबंधन: बालासाहेब ने अपना राजनीतिक करियर कांग्रेस और कम्युनिस्ट विरोधी रुख पर बनाया था। उन्होंने एक बार प्रसिद्ध रूप से कहा था कि वे कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बजाय शिवसेना को भंग कर देंगे। 2019 में, उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने के लिए एक अकल्पनीय कदम उठाया: उन्होंने लंबे समय के सहयोगी भाजपा से नाता तोड़ा और कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाई। बालासाहेब के लिए, एक ठाकरे मुख्यमंत्री को उन पार्टियों के साथ गठबंधन में देखना, जिन्हें उन्होंने जीवन भर कोसा, उनकी वैचारिक शुद्धता के साथ एक भयानक विश्वासघात होता।
  • भाजपा के सामने 'बड़े भाई' का दर्जा खोना: भगवा गठबंधन में, शिवसेना हमेशा महाराष्ट्र में निर्विवाद 'बड़ा भाई' थी, और भाजपा कनिष्ठ भागीदार हुआ करती थी। दिल्ली के राष्ट्रीय नेता आशीर्वाद लेने या शर्तों पर बातचीत करने के लिए 'मातोश्री' आते थे। आधुनिक मुंबई में, सत्ता का समीकरण पूरी तरह पलट गया है। भाजपा अब मुंबई और महाराष्ट्र में प्रमुख राजनीतिक ताकत है। शिवसेना के दोनों गुट अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं—एक भाजपा पर निर्भर है (शिंदे गुट) और दूसरा उसके खिलाफ हताश लड़ाई लड़ रहा है (उद्धव गुट)। सत्ता का केंद्र निश्चित रूप से 'मातोश्री' से दूर खिसक गया है।
  • बदलती जनसांख्यिकी: 'मराठी भाषी' आबादी के लिए मुंबई को सांस्कृतिक रूप से सुरक्षित करने की दशकों की 'भूमिपुत्र' राजनीति के बावजूद, शहर की जनसांख्यिकीय वास्तविकता विपरीत दिशा में बढ़ी है। आज का मुंबई पहले से कहीं अधिक महानगरीय (कॉस्मोपॉलिटन) है। बड़े पैमाने पर प्रवासन और अन्य कारकों के कारण, शहर में मूल मराठी भाषियों का प्रतिशत हिंदी भाषियों और अन्य समूहों के सापेक्ष कम होता जा रहा है। बालासाहेब को यह महसूस करके गहरा धक्का लगता कि उनके आजीवन धर्मयुद्ध के बावजूद, मुंबई के जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक ज्वार को रोका नहीं जा सका।

सार यह है कि बालासाहेब ठाकरे मुंबई से शारीरिक रूप से नहीं डरते; वे टकराव में पनपने वाले व्यक्ति थे। लेकिन, अगर वे आज जीवित होते, तो वे एक ऐसी मुंबई को देखकर गहराई से विचलित हो जाते जहां उनकी पार्टी टूट चुकी है, उनका बेटा उनके पुराने वैचारिक शत्रुओं के साथ है, और उनका राजनीतिक प्रभुत्व उनके पूर्व कनिष्ठ भागीदार, भाजपा द्वारा हथिया लिया गया है। उन्हें इस अहसास से 'डर' लगता कि शहर की आत्मा पर से उनकी पकड़ आखिरकार छूट गई है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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