कांस्टेबल को दी धमकी; 13 साल सुनवाई के बाद बरी हुआ शख्स
ठाणे अदालत ने 13 साल पुराने मामले में ट्रैफिक कांस्टेबल पर हमले और धमकी के आरोपी रघुनाथ बुगे को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष गवाहों के विरोधाभासी और अविश्वसनीय बयानों के कारण आरोप साबित करने में विफल रहा।

मुंबई। कभी ट्रैफिक कांस्टेबल से कथित रूप से हाथापाई करने और धमकी देने के आरोप में घिरा एक व्यक्ति, तेरह साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार न्यायालय से बरी हो गया। ठाणे की एक सत्र अदालत ने 2012 में दर्ज इस मामले में अभियोजन पक्ष के बयानों में विरोधाभास और विश्वसनीय साक्ष्य की कमी बताते हुए आरोपी रघुनाथ नाना बुगे को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है।
यह मामला 6 मार्च 2012 का है, जब घोड़बंदर रोड पर ट्रैफिक नियंत्रण के दौरान बुगे और ट्रैफिक हेड कांस्टेबल चंद्रकांत दयानंद बिदाये के बीच विवाद हुआ था। बिदाये ने आरोप लगाया था कि बुगे ने अपने डंपर पर लगाए गए जैमर को हटाने के प्रयास का विरोध करते हुए उन पर हमला किया और हाथ-पैर काटने की धमकी दी। उस समय पुलिस ने घटना को गंभीर मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 353 (लोक सेवक पर हमला), 504 (जानबूझकर अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया था।
इसके बाद से यह मामला न्यायालय में वर्षों तक चलता रहा। आरोपी बुगे लगातार अपनी बेगुनाही का दावा करते रहे, जबकि अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने का प्रयास किया कि बुगे ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी पर हमला किया था। मगर 13 वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन के तर्कों में गंभीर विसंगतियां हैं, जिनके आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। एक गवाह ने कहा कि आरोपी कार से मौके पर पहुंचा और कांस्टेबल से झगड़ा किया, जबकि अभियोजन पक्ष के ही दूसरे गवाह ने जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि कार के चालक या मालिक से कोई झगड़ा नहीं हुआ था। अदालत ने टिप्पणी की कि इस विरोधाभास ने अभियोजन की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर दिया।
न्यायाधीश ने आगे कहा कि घटना के प्रत्यक्षदर्शी के रूप में प्रस्तुत क्रेन चालक की गवाही भी घटना के विवरण से मेल नहीं खाती। साथ ही, जांच अधिकारी द्वारा किसी स्वतंत्र गवाह का बयान दर्ज न किए जाने पर भी अदालत ने सवाल उठाया। आदेश में कहा गया कि जब मौके पर स्वतंत्र गवाह मौजूद थे, तो उनके बयान दर्ज न करना जांच की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करता है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को साबित करने में असफल रहा है। परिणामस्वरूप, रघुनाथ नाना बुगे को भारतीय दंड संहिता की धारा 353, 504 और 506 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
3 अक्टूबर को पारित इस आदेश की प्रति सोमवार को सार्वजनिक हुई, जिससे मामले का लंबा अध्याय आखिरकार समाप्त हुआ। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना करना है। जब तक दोष संदेह से परे साबित न हो, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इस फैसले के साथ 13 वर्षों से अदालत के चक्कर काट रहे बुगे को आखिर राहत मिली। यह मामला न केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत लड़ाई का अंत है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि और अभियोजन में ठोस साक्ष्य की आवश्यकता पर भी प्रश्न उठाता है। अदालत का यह निर्णय इस बात की याद दिलाता है कि न्याय में विलंब भले हो, परंतु जब प्रमाण अपूर्ण हों, तो निर्दोष को सज़ा नहीं दी जा सकती।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
