मुंबई में पर्युषण पर्व के अवसर पर साध्वी सुधा कंवर ने आत्मजागरण, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का संदेश दिया। साध्वी सुयशा ने बोध एवं ज्ञान के साथ जीवन जीने और ‘पर’ से ‘स्व’ की ओर लौटने का आह्वान किया।

तस्वीर में मुंबई में आयोजित धर्मसभा के दौरान मंच पर साध्वीवृंद सफेद वस्त्रों में बैठी हुई नजर आ रही हैं।
मुंबई। पर्युषण पर्व मनुष्य की सुप्त चेतना को जगाने और अंतर्मन में आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न करने का अवसर प्रदान करते हैं। ये पर्व भोग से योग, वासना से उपासना, राग से विराग तथा भुक्ति से मुक्ति की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं। धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी सुधा कंवर ने यह विचार व्यक्त किए।
साध्वी सुधा कंवर ने कहा कि पर्युषण केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मजागरण का अवसर है। इस दौरान व्यक्ति को अपने भीतर झांककर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने अंतःकृत दशांगसूत्र की महिमा एवं गरिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए इसके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला।
धर्मसभा में साध्वी सुयशा ने कहा कि केवल जीवन गुजार देना कोई बड़ी बात नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि जीवन बोध और ज्ञान के साथ गुजरे। धर्म जागृति का अर्थ केवल कुछ धार्मिक क्रियाएं कर लेना नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन का विवेक एवं आत्मबोध के साथ निर्वहन करना है।
उन्होंने कहा कि जब तक जीव स्वयं को नहीं समझ पाएगा, तब तक वह संसार और अध्यात्म के वास्तविक स्वरूप को भी समझने में असमर्थ रहेगा। पर्युषण पर्व ऐसा अवसर लेकर आते हैं, जब व्यक्ति ‘पर’ से ‘स्व’ की ओर लौट सकता है और अपने जीवन का ज्ञान एवं विवेक के साथ अवलोकन कर सकता है।
धर्मसभा में साध्वीवृंद ने श्रद्धालुओं से पर्युषण पर्व के आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात करते हुए आत्मचिंतन, संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर मेवाड़ संघ एवं स्थानीय संघ सहित संघीय संस्थाओं के पदाधिकारी एवं पनवेल के श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे।

