मुंबई के राजनीति के 'भीष्म' और राजस्थानी समाज के दिग्गज नेता राज के पुरोहित का महाप्रयाण, शोक में डूबा महाराष्ट्र

मुंबई। मायानगरी मुंबई के सियासी क्षितिज पर दशकों तक चमकने वाले एक कद्दावर सितारे और राजस्थानी प्रवासियों की बुलंद आवाज, राज के पुरोहित अब हमारे बीच नहीं रहे। महाराष्ट्र के पूर्व कैबिनेट मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार राज के पुरोहित का शनिवार रात मुंबई के एक अस्पताल में उपचार के दौरान निधन हो गया। उनके अवसान की खबर मिलते ही न केवल राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई, बल्कि मुंबई में बसे लाखों राजस्थानी प्रवासियों के बीच एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है जिसे भरना निकट भविष्य में संभव नहीं दिखता।

31 अगस्त 1955 को राजस्थान के सिरोही जिले के फुगनी गांव की मिट्टी में जन्मे राज के पुरोहित ने मुंबई को अपनी कर्मभूमि बनाया और पिछले साढ़े चार दशकों से वे यहां की राजनीति और समाजसेवा के केंद्र बिंदु बने रहे। एक प्रखर वक्ता और कुशल रणनीतिकार के रूप में उनकी पहचान इतनी सशक्त थी कि वे मुंबादेवी और कोलाबा जैसे प्रतिष्ठित विधानसभा क्षेत्रों से पांच बार विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे। भाजपा के पूर्व मुंबई अध्यक्ष के रूप में संगठन को धार देने वाले पुरोहित ने महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया।

उनका व्यक्तित्व केवल सत्ता और पदों तक सीमित नहीं था; वे सही मायने में 'प्रवासी राजस्थानी समाज के मसीहा' थे। अखिल भारतीय राजस्थानी प्रवासी महासंघ के संस्थापक अध्यक्ष और अखिल भारतीय राजस्थानी मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने मुंबई में बिखरे हुए राजस्थानी समाज को एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक कार्य किया। व्यापारिक बाधाओं को दूर करने से लेकर महिला शिक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए क्रांतिकारी कार्यों ने उन्हें समाज का सर्वमान्य नेता बना दिया। अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी उन्होंने राजस्थान एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका जैसी संस्थाओं के माध्यम से प्रवासियों की ताकत को एकजुट किया।

रविवार दोपहर मुंबई के मरीन लाइन्स स्थित हिंदू श्मशान भूमि, चंदनवाड़ी में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके अंतिम सफर में उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह था कि राज के पुरोहित ने केवल चुनाव नहीं, बल्कि लोगों के दिल जीते थे। राजस्थानी संस्कृति, परंपराओं और एकता के संरक्षण के लिए उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बना रहेगा। महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच के एक मजबूत सेतु का ढह जाना भारतीय राजनीति और सामाजिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

Pratahkal Bureau

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