मुंबई। वर्ष 2024 में एक महिला की मौत, जिसे प्रारंभिक रूप से आत्महत्या करार दिया गया था, अब फिर से जांच के दायरे में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट में उठी गंभीर विसंगतियों को देखते हुए यह तय करने की प्रक्रिया शुरू की है कि मामले की जांच किस एजेंसी को सौंपी जाए।

यह मामला मुंबई निवासी गीता सकाराम चौधरी की मृत्यु से जुड़ा है, जिनका 14 अक्टूबर 2024 को निधन हुआ था। शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे फांसी लगाकर आत्महत्या का मामला मानते हुए बंद कर दिया। लेकिन मृतका के परिवार ने इस निष्कर्ष को स्वीकार करने से इनकार किया और हत्या की आशंका जताई। परिवार का दावा है कि गीता ने मौत से कुछ घंटे पहले तक किसी मानसिक परेशानी का संकेत नहीं दिया था।

मृतका के भाई दिनेश चौधरी ने कहा कि गीता स्वभाव से आत्मविश्वासी और खुले विचारों वाली महिला थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके नाबालिग भतीजे का बयान दर्ज नहीं किया और मामले को जल्दबाजी में बंद करने की कोशिश की। परिवार के अनुसार, शव के गले पर खरोंच के निशान और फंदे के दो अलग-अलग निशान पाए गए, जो फांसी के सामान्य निशान से मेल नहीं खाते।

इसके अलावा परिवार ने बताया कि गीता के ससुराल पक्ष ने अंतिम संस्कार जल्द करने का दबाव बनाया। एंबुलेंस में ली गई शव की तस्वीरों में भी संदिग्ध चोटों के निशान स्पष्ट थे। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि साकीनाका पुलिस ने मौत के कारण पर संदेह जताने वाला बयान दर्ज करने से इनकार किया, जिसके कारण उन्हें राजस्थान जाना पड़ा और वहां जीरो एफआईआर दर्ज कराई गई। बाद में मामला पुनः मुंबई स्थानांतरित किया गया।

हाईकोर्ट के निर्देश पर राजस्थान के पाली में मेडिकल बोर्ड द्वारा पुनः पोस्टमार्टम कराया गया। 17 नवंबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने सर जेजे अस्पताल से फॉरेंसिक विशेषज्ञों की राय मांगी। फॉरेंसिक रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ निष्कर्ष फांसी से मेल खाते हैं, लेकिन गला घोंटकर हत्या की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती। 27 नवंबर की सुनवाई में विशेषज्ञों ने आत्महत्या की संभावना पर संदेह जताया और इसे काफी संदिग्ध बताया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक संतोषजनक जांच नहीं होती, मामले पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जाएगा। इसके साथ ही यह तय किया गया कि 16 दिसंबर को यह निर्णय लिया जाएगा कि जांच मुंबई पुलिस के पास रहेगी या किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाएगी।

इस मामले ने पुलिस जांच, फॉरेंसिक विज्ञान और न्यायिक प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, और मृतक परिवार के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया अब हाईकोर्ट के समक्ष अहम मोड़ पर है।

Pratahkal Bureau

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