मुंबई: संवत्सरी पर मुनि कुलदीप व मुकुल कुमार के प्रवचन, 1100 श्रद्धालुओं ने मांगी क्षमा
भगवान महावीर के जीवन प्रसंगों के वाचन और जैनाचार्यों की प्रभावकता पर व्याख्यान के बाद श्रद्धालुओं ने मिच्छामि दुक्कडम् कहकर परस्पर क्षमायाचना की।

तस्वीर में मंच पर सफेद वस्त्र और मास्क पहने जैन मुनि मुनि कुलदीप कुमार और मुनि मुकुल कुमार बैठे हैं।
मुंबई। जैन धर्म के महान आध्यात्मिक पर्व संवत्सरी महापर्व पर श्रद्धा, साधना, क्षमाभाव और आत्ममंथन से ओतप्रोत वातावरण में आयोजित विशेष धार्मिक कार्यक्रम में 1100 से अधिक लोगों ने भाग लिया। मुनि कुलदीप कुमार एवं मुनि मुकुल कुमार ने प्रभावशाली प्रवचनों के माध्यम से भगवान महावीर की साधना, संवत्सरी के आध्यात्मिक महत्व और जैनाचार्यों की प्रभावकता से श्रद्धालुओं को परिचित कराया।
मुनि कुलदीप कुमार ने भगवान महावीर के रोमांचक एवं जीवंत चरित्र का वाचन करते हुए उनके साधना काल से जुड़े विविध प्रसंगों को प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन में आए संघर्ष, परीषह, उपसर्ग, तप, त्याग और अदम्य आत्मबल का वर्णन करते हुए बताया कि महावीर का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि आत्मविजय की ऐसी जीवंत यात्रा है, जो आज भी प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से जागृत करने की क्षमता रखती है।
चरित्र वाचन के दौरान भगवान महावीर के जीवन से जुड़े प्रसंगों को इतने सजीव और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया कि श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान महावीर की साधना और संघर्ष की घटनाएं आंखों के सामने घटित हो रही हों। अनेक प्रसंगों ने श्रोताओं के अंतर्मन को स्पर्श किया और पूरा वातावरण आध्यात्मिक अनुभूति से भर गया।
मुनि कुलदीप कुमार ने संवत्सरी महापर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संवत्सरी केवल परंपरा निभाने का दिन नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने, वर्षभर के कर्मों का मूल्यांकन करने और आत्मा को निर्मल बनाने का अवसर है। क्षमा का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक है, जब मन में किसी के प्रति द्वेष, प्रतिशोध अथवा कटुता शेष न रहे। संवत्सरी व्यक्ति को बाहरी संबंधों के साथ-साथ अपने अंतर्मन को भी शुद्ध करने की प्रेरणा देती है।
इसके बाद मुनि मुकुल कुमार ने “जैनाचार्यों की प्रभावकता” विषय पर रोचक एवं चिंतनपरक वक्तव्य दिया। उन्होंने जैनाचार्यों के प्रभावशाली व्यक्तित्व, साधना की ऊंचाई, ज्ञान की प्रखरता, संयम की शक्ति और समाज को दिशा देने वाली उनकी भूमिका को अनेक प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से विस्तारपूर्वक समझाया।
मुनि मुकुल कुमार ने बताया कि जैनाचार्यों की प्रभावकता केवल उनके शब्दों में नहीं, बल्कि उनके जीवन की साधना, आचरण और आत्मानुशासन में निहित रही है। जिन आचार्यों ने अपने जीवन में संयम, तप और त्याग को उतारा, उनके व्यक्तित्व ने हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। उनका जीवन स्वयं एक संदेश और उनका आचरण स्वयं एक प्रेरणा बन गया।
उनका वक्तव्य आकर्षक, रोमांचकारी और भावस्पर्शी रहा। जैनाचार्यों के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का वर्णन करते हुए उन्होंने श्रोताओं को कभी चिंतन में डुबोया तो कभी भावनाओं से भर दिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर प्रवचन सुनते रहे। कई प्रसंगों पर वातावरण इतना भावुक हो गया कि उपस्थित जनसमुदाय की आंखें नम हो उठीं।
संवत्सरी महापर्व का यह आयोजन भगवान महावीर के आदर्शों, क्षमा की भावना, आत्मशुद्धि और जैनाचार्यों की प्रेरणादायी परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने वाला रहा। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने आत्मावलोकन करते हुए “मिच्छामि दुक्कडम्” की भावना के साथ परस्पर क्षमायाचना की और जीवन में अहिंसा, संयम, मैत्री तथा क्षमा को अपनाने का संकल्प लिया।
समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और भावनात्मक अनुभूति से सराबोर रहा। संवत्सरी महापर्व ने उपस्थित श्रद्धालुओं को यही संदेश दिया कि सच्ची क्षमा केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा को हल्का करने वाली साधना है और सच्चा धर्म वही है जो जीवन में परिवर्तन लेकर आए। उपासक जीतमल बरलोटा ने अपने भावपूर्ण उदगार व्यक्त किए। मंगलाचरण तेरापंथ कन्या मंडल ने किया।

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