मुंबई में बढ़ रहा भूजल का खारापन, बीएमसी और वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
बीएमसी मुख्यालय में हुई कार्यशाला में विशेषज्ञों ने गिरते जल स्तर को रोकने के लिए आर्टिफिशियल रिचार्ज और एक्विफर मैपिंग के इस्तेमाल पर जोर दिया।

मुंबई महानगरपालिका मुख्यालय में भूजल प्रबंधन पर आयोजित कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने जल संकट और खारेपन के खतरे पर चर्चा की।
प्रातःकाल संवाददाता, मुंबई। कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती मुंबई के लिए आने वाले समय में पानी का संकट गहरा सकता है। शुक्रवार को मुंबई महानगरपालिका मुख्यालय में हुई एक उच्च स्तरीय कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने एक गंभीर चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भूगर्भीय जल का प्रबंधन अभी नहीं किया गया, तो समुद्र के किनारे बसे होने के कारण मुंबई के जमीन के नीचे मौजूद मीठे पानी के स्रोतों में खारापन तेजी से बढ़ सकता है। बीएमसी कमिश्नर भूषण गगराणी के मार्गदर्शन में आयोजित इस बैठक में केंद्र सरकार के वरिष्ठ जल वैज्ञानिक उपेंद्र धोंडे ने 'एक्विफर मैपिंग' और 'नेशनल ग्राउंडवॉटर मैनेजमेंट' के चौंकाने वाले निष्कर्ष साझा किए।
गिरता भूजल स्तर और खारेपन का खतरा
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि मुंबई के शाश्वत विकास के लिए केवल बारिश के भरोसे रहना काफी नहीं है। जमीन के नीचे पानी का स्तर जिस तेजी से गिर रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए अब 'आर्टिफिशियल रिचार्ज' यानी कृत्रिम रूप से जमीन को पानी पिलाने की तकनीक अपनानी होगी। कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि हमें पाताल के पानी का 'ऑडिट' करना होगा ताकि यह पता चल सके कि हम कितना पानी निकाल रहे हैं और कितना वापस जमीन में जा रहा है। इस दौरान 'अटल भूजल योजना' और 'मिशन अमृत सरोवर' जैसी योजनाओं के जरिए आम जनता को इस मुहिम से जोड़ने पर भी चर्चा हुई।
कृत्रिम पुनर्भरण और भविष्य की रणनीति
इस मौके पर एक खास किताब 'कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं की सफलता की कहानियाँ' का विमोचन भी किया गया। बीएमसी के पर्यावरण विभाग और जल विशेषज्ञों ने माना कि अब समय आ गया है जब भूजल नियमन के लिए कड़े कानून बनाए जाएं। बैठक में मौजूद 50 से अधिक प्रतिनिधियों ने यह संकल्प लिया कि मुंबई की प्यास बुझाने के लिए अब पाताल के पानी को सहेजना प्राथमिकता होगी, वरना भविष्य में खारा पानी हमारी नसों में घुल जाएगा।

Pratahkal Bureau
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