मुंबई में मानसून की दस्तक से पूर्व ही शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली मीठी नदी की दुर्दशा ने बीएमसी के प्रशासनिक दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। मनसे के वरिष्ठ नेता और पूर्व नगरसेवक यशवंत किल्लेदार ने नदी की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने हेतु स्वयं नाव के जरिए निरीक्षण किया, जिसके बाद उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्य प्रशासन के 104 प्रतिशत नाला सफाई के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए पर्याप्त हैं। नदी की वर्तमान स्थिति किसी पवित्र जलधारा के विपरीत एक 'गटर गंगा' जैसी प्रतीत हो रही है, जो शहर की तैयारियों की पोल खोल रही है।

निरीक्षण के दौरान यशवंत किल्लेदार ने पाया कि नदी के भीतर प्लास्टिक, थर्माकोल, घरेलू कचरे और गाद का विशाल अंबार जमा है, जिसने जल के प्राकृतिक प्रवाह को कई स्थानों पर पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया है। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का बजट खर्च किए जाने के बावजूद नदी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। सबूत के तौर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि नदी में गाद की परत इतनी अधिक है कि पानी में डंडा डालने पर वह मात्र तीन फीट की गहराई पर ही कीचड़ में धंस जाता है।

यशवंत किल्लेदार ने इस तकनीकी पहलू पर भी जोर दिया कि मुंबई के अधिकांश नालों का कचरा अंततः मीठी नदी में ही समाहित होता है और माहिम की खाड़ी के माध्यम से समुद्र में जाता है। यही कारण है कि दादर से माहिम तक तटों की सफाई के बावजूद समुद्री लहरें पुनः वही कचरा किनारों पर उगल देती हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि मानसून पूर्व युद्ध स्तर पर गाद की सफाई नहीं की गई, तो मुंबई को भीषण बाढ़ और जलभराव के संकट से बचाना असंभव होगा। स्थानीय निवासियों में भी इस बदहाली के प्रति गहरा आक्रोश है। नागरिकों ने मांग की है कि प्रशासन कागजी दावों के स्थान पर सीसीटीवी के माध्यम से निरंतर निगरानी करे, कचरा फैलाने वालों पर कड़ा जुर्माना लगाए और मानसून से पूर्व नदी को गाद मुक्त बनाए ताकि मुंबई के अस्तित्व पर संकट न मंडराए।

Pratahkal Newsroom

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