हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार की पावन धरा पर स्थित पतंजलि योगपीठ ने अपने गौरवशाली इतिहास के 32 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। स्थापना दिवस के इस विशेष अवसर पर पतंजलि की आत्मा और इसके स्वप्नद्रष्टा स्वामी रामदेव तथा महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने न केवल संस्थान की उपलब्धियों को साझा किया, बल्कि एक वैभवशाली और विकसित भारत के निर्माण हेतु वैश्विक आह्वान भी किया। योग, आयुर्वेद और स्वदेशी के संकल्प के साथ शुरू हुई यह यात्रा अब सनातन शिक्षा और वैश्विक अनुसंधान के उस शिखर पर पहुँच चुकी है, जहाँ से समूचे विश्व को एक नई दिशा देने की तैयारी है।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए स्वामी रामदेव ने ऋषि-ऋषिकाओं के वंशधरों और भावी पीढ़ी को संबोधित किया। उन्होंने अत्यंत भावुक और ओजस्वी स्वर में कहा कि पतंजलि आज केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण का सबसे पावन केंद्र बन चुका है। उन्होंने बल दिया कि पतंजलि की मूल आत्मा वास्तव में सनातन की ही आत्मा है। उन्होंने योग, आयुर्वेद, स्वदेशी और सनातन धर्म के साथ-साथ सनातन चिकित्सा, अनुसंधान और कृषि व्यवस्था को जीवन का आधार बनाने पर जोर दिया। स्वामी रामदेव ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि अपनी महान विरासत पर गर्व करें और इसके माध्यम से अपने भीतर असीम ज्ञान, अटूट भक्ति और प्रचंड सामर्थ्य को जागृत कर राष्ट्र सेवा में समर्पित हों।

शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव का रोडमैप साझा करते हुए स्वामी रामदेव ने कहा कि वर्तमान में भारतीय प्रतिभाएं उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर रुख करती हैं, लेकिन अब समय बदल रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पतंजलि गुरुकुलम् आज वैश्विक आकर्षण का केंद्र बन चुका है। संस्थान का आगामी लक्ष्य दुनिया के लगभग 200 देशों से 15-20 हजार विद्यार्थियों को पतंजलि गुरुकुलम्, आचार्यकुलम् और पतंजलि विश्वविद्यालय की ओर आकर्षित करना है। उन्होंने घोषणा की कि शैक्षणिक सेवाओं के अगले चरण में पतंजलि ग्लोबल गुरुकुलम् और पतंजलि ग्लोबल यूनिवर्सिटी के माध्यम से शिक्षा की सभी आधुनिक शाखाओं को सनातन मूल्यों के साथ स्थापित किया जाएगा।

स्थापना दिवस के इस उत्सव में पतंजलि के विभिन्न शिक्षण संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने अपनी शारीरिक और मानसिक दक्षता का अद्भुत परिचय दिया। योग, मलखम्भ, कुश्ती, मार्शल आर्ट्स, बॉक्सिंग और जूडो-कराटे की शानदार प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह प्रदर्शन इस बात का प्रतीक था कि पतंजलि केवल बौद्धिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक सुदृढ़ता को भी शिक्षा का अनिवार्य अंग मानता है। कार्यक्रम के दौरान संगठन को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से कई सेवाभावी व्यक्तियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं। आचार्य बालकृष्ण ने इस अवसर पर गौमाता और भारत माता की सेवा को संस्थान का सर्वोपरि लक्ष्य बताया। यह आयोजन न केवल पतंजलि की सफलता का उत्सव था, बल्कि भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन करने के अटूट संकल्प का भी जीवंत प्रमाण रहा।

Pratahkal Bureau

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