मुंबई: घाटकोपर में साध्वी निर्वाणश्री के सान्निध्य में वर्धमान कार्यशाला संपन्न
जैन समाज के उपासकों के लिए आयोजित इस विशेष सत्र में सम्यक दर्शन की शुद्धता और जीवन के तीन अनमोल रत्नों की रक्षा करने पर विशेष बल दिया गया।

महानगर के घाटकोपर क्षेत्र में साध्वी निर्वाणश्री के परम सान्निध्य में बृहत्तर मुंबईस्तरीय वर्धमान कार्यशाला का गरिमामयी एवं भव्य आयोजन संपन्न हुआ, जिसने श्रावकों और उपासकों में एक नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया है। इस उच्चस्तरीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता साध्वी निर्वाणश्री ने अत्यंत गंभीर और प्रेरक संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संपूर्ण उपासक श्रेणी को स्वयं भीतर से वर्धमान बनना चाहिए और इसके लिए सम्यक दर्शन की शुद्धता पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है। आध्यात्मिक विकास के इस मार्ग पर प्रकाश डालते हुए साध्वी योगक्षेमप्रभा ने जीवन के मूल सिद्धांतों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही वास्तव में मानव जीवन के तीन अनमोल रत्न हैं, और इन त्रिरत्नों की पवित्रता की रक्षा करना प्रत्येक श्रावक, उपासक तथा साधक का परम नैतिक एवं आध्यात्मिक दायित्व है।
इस महत्वपूर्ण कार्यशाला के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सत्र में साध्वी योगक्षेमप्रभा, साध्वी लावण्यप्रभा, साध्वी कुंदनयशा, साध्वी मुदितप्रभा एवं साध्वी मधुरप्रभा ने संयुक्त रूप से प्रेरणादायी ‘वर्धमान हो श्रेणी उपासक’ गीत की सुमधुर संगीतमय प्रस्तुति दी, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम के दौरान कुमुद कच्छारा ने कार्यशाला के वैचारिक सत्र से जुड़े अपने सारगर्भित अनुभव उपस्थित जनसमुदाय के साथ साझा किए। इससे पूर्व, मुंबई उपासक श्रेणी के संयोजक हस्तीमल डांगी ने समस्त अतिथियों एवं संतों का आत्मीय स्वागत किया। आयोजन में जैन समाज के प्रमुख पदाधिकारियों, जिनमें मुंबई सभा मंत्री दिनेश सुतरिया, घाटकोपर सभा अध्यक्ष शांतिलाल कोठारी एवं तेयुप अध्यक्ष राकेश सुराणा शामिल थे, ने अपने प्रभावशाली विचार व्यक्त करते हुए कार्यशाला की प्रासंगिकता को प्रतिपादित किया। आध्यात्मिक जिज्ञासाओं और शंकाओं के समाधान सत्र में रतन सियाल, सुधांशु चंडालिया और हस्तीमल डांगी ने उपासकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का अत्यंत कुशलतापूर्वक निवारण किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में मुंबई सभा उपाध्यक्ष सुरेश राठौड़ ने सभी आगंतुकों, संतों और सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए आभार प्रदर्शन किया। यह कार्यशाला समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और आत्म-कल्याण के मार्ग को सुदृढ़ करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुई है।

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