पीपीपी मॉडल पर बीएमसी में हंगामा, निजीकरण के मुद्दे पर सत्ता पक्ष-विपक्ष आमने-सामने
बीएमसी में पीपीपी मॉडल और निजीकरण पर सत्ता पक्ष-विपक्ष भिड़े। जमीन, स्कूल, पार्क और पुनर्वसन के मुद्दे पर तीखी बहस हुई।

बृहन्मुंबई महानगरपालिका के सभागार में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत जमीनों और सुविधाओं के निजीकरण के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार बहस हुई। विरोधी पक्ष नेता किशोरी पेडणेकर ने बीएमसी प्रशासन और सत्ताधारी दल पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि मुंबई की कीमती खाली जमीनों, स्कूलों, पार्कों और बाजारों को निजी बिल्डरों के हवाले कर आम जनता के हितों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
किशोरी पेडणेकर ने सवाल उठाया कि जब बीएमसी के पास हजारों करोड़ रुपये की सावधि जमा मौजूद है, तो निजी साझेदारों की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि पीपीपी नीति के नाम पर गरीब बच्चों से शिक्षा और खेल के मैदान छीने जा रहे हैं। उन्होंने इस नीति को तुरंत रद्द करने और दी गई संपत्तियों का विशेष ऑडिट कराने की मांग की।
दूसरी ओर, सत्ताधारी पार्षदों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। भाजपा नगरसेवक ने कहा कि बेकार पड़ी और गंदी जमीनों का सही उपयोग करने के लिए सुरक्षा दीवारें और खेल के मैदान बनाए जा रहे हैं।
कांग्रेस नगरसेवक अशरफ आजमी ने भी बीएमसी प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि जमीनों के आरक्षण बदलकर उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि कपड़ा मिल मजदूरों के पुनर्वसन को मुंबई से बाहर ले जाने से डेढ़ लाख मराठी परिवार विस्थापित हो सकते हैं। इस बयान पर सत्ताधारी सदस्यों ने तीखा ऐतराज जताया।
दोनों पक्षों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए मुंबई की महापौर ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी स्थिति में मराठी भाषी लोगों को मुंबई से बाहर विस्थापित नहीं होने दिया जाएगा। पीपीपी मॉडल के तहत बीएमसी की जमीनों और सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर हुई यह बहस निजीकरण, सार्वजनिक संपत्तियों और पुनर्वसन से जुड़े मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे मतभेद को सामने ले आई।

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