मुंबई। बृहन्मुंबई महानगरपालिका के स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग तीन लाख बच्चों को मिलने वाले दोपहर के भोजन यानी मिड-डे मील की गुणवत्ता को लेकर बीएमसी स्थायी समिति की बैठक में जोरदार बहस हुई। भोजन की खराब गुणवत्ता, ब्लैकलिस्टेड संस्थाओं को दोबारा काम देने और बिना किचन वाली फर्जी संस्थाओं के चयन को लेकर स्थायी समिति के सदस्यों ने बीएमसी प्रशासन से सवाल किए।

शिक्षा समिति की अध्यक्षा राजश्री शिरवाडकर ने महिला बचत गुटों को प्राथमिकता देने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन संस्थाओं को पहले काली सूची में डाला गया था, उन्हें दोबारा बच्चों के भोजन का ठेका क्यों दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कई संस्थाओं के पास खाना बनाने के लिए अपना खुद का किचन तक नहीं है। इसके बावजूद उन्हें किस आधार पर अनुमति दी गई, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

नगरसेवक अशरफ आजमी और डॉ. सैदा खान ने भी बच्चों को दिए जाने वाले भोजन में जरूरी प्रोटीन और कैलोरी की मात्रा सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने इस्कॉन जैसी बड़ी संस्थाओं के सेंट्रल किचन मॉडल को अपनाने का सुझाव दिया।

बैठक में सदस्यों ने स्पष्ट किया कि बच्चों के पोषण से जुड़े भोजन की गुणवत्ता में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। प्रशासन से संस्थाओं के चयन और भोजन की गुणवत्ता से जुड़े मानकों की जांच पर भी सवाल किए गए।

प्रशासन की ओर से पक्ष रखते हुए अतिरिक्त बीएमसी आयुक्त डॉ. अविनाश ढाकणे ने कहा कि बच्चों को पौष्टिक और साफ-सुथरा भोजन देना बीएमसी की पहली जिम्मेदारी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सभी शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए किचन और भोजन की गुणवत्ता की कड़ी जांच कराई जाएगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्थाओं की पात्रता और उनके पिछले काम के रिकॉर्ड की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। स्थायी समिति की बैठक में उठे सवालों के बाद अब मिड-डे मील की गुणवत्ता, किचन व्यवस्था और संबंधित संस्थाओं के पिछले रिकॉर्ड की जांच पर प्रशासन की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

Pratahkal Newsroom

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