मुंबई महानगरपालिका में विकास की गति और पर्यावरण संरक्षण के नियमों के बीच छिड़ा द्वंद्व एक बार फिर सतह पर आ गया है। पूर्वी उपनगरों के लिए प्रस्तावित 235 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना वर्तमान में गंभीर विवादों और तकनीकी अड़चनों के घेरे में फंस गई है। बीएमसी की हालिया बैठक में नगरसेवकों ने इस प्रोजेक्ट की वैधानिकता और वन विभाग की अनिवार्य अनुमति को लेकर प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारी हंगामे के बीच प्रशासन को इस प्रस्ताव को 'नॉट टेकन' श्रेणी में डालने पर विवश होना पड़ा।

सदन में चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस नगरसेवक अशरफ आजमी ने तीखे सवाल दागते हुए पूछा कि क्या इस सड़क निर्माण के लिए वन विभाग से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया गया है? उन्होंने प्रशासन को सचेत करते हुए एक पूर्ववर्ती पीएपी परियोजना का उदाहरण दिया, जिसे वन विभाग ने केवल इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि वह क्षेत्र 'बफर जोन' के दायरे में आता था। आजमी ने स्पष्ट रूप से आशंका व्यक्त की कि बिना पुख्ता कागजी कार्रवाई और आधिकारिक मंजूरी के इतने बड़े वित्तीय बजट वाले प्रोजेक्ट पर कार्य आरंभ करना सीधे तौर पर पर्यावरण नियमों का उल्लंघन होगा।

प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए भाजपा नगरसेविका प्रीति साटम ने भी अधूरी जानकारी साझा करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। साटम ने तर्क दिया कि प्रशासन ने दस्तावेज में सड़क की चौड़ाई का विवरण तो प्रस्तुत किया है, परंतु इसकी कुल लंबाई को लेकर रहस्यमयी चुप्पी साध ली है। इस परियोजना का सबसे संवेदनशील मानवीय पक्ष विस्थापन से जुड़ा है; आंकड़ों के अनुसार इस सड़क के निर्माण की जद में लगभग 1567 झोपड़पट्टियां आ रही हैं। नगरसेवकों ने दोटूक शब्दों में कहा कि जब तक वन विभाग की मंजूरी और प्रभावित निवासियों के पुनर्वास की कोई पारदर्शी नीति स्पष्ट नहीं होती, तब तक जनता की गाढ़ी कमाई के 235 करोड़ रुपये दांव पर नहीं लगाए जा सकते। सदन में व्याप्त इसी तकनीकी अस्पष्टता और भारी विरोध के मद्देनजर महापौर ने फिलहाल प्रस्ताव पर किसी भी निर्णय को टाल दिया है। अब बीएमसी के समक्ष वन विभाग की एनओसी प्राप्त करने और पार्षदों के संशयों का समाधान करने की कड़ी चुनौती है।

Pratahkal Bureau

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