2011 मुंबई तिहरा बम धमाका: 13 साल बाद आरोपी कफील अहमद को मिली जमानत, हाईकोर्ट ने कहा—न्याय में देरी नहीं होनी चाहिए अन्याय का कारण
2011 मुंबई तिहरा बम विस्फोट मामले में 13 साल से जेल में बंद आरोपी कफील अहमद को बंबई उच्च न्यायालय ने जमानत दी। 27 लोगों की मौत और 120 घायल होने वाले इस आतंकी हमले की जांच एटीएस ने की थी। अदालत ने लंबे मुकदमे और साक्ष्यों की स्थिति को देखते हुए यह निर्णय सुनाया।

मुंबई। 2011 में मुंबई को दहला देने वाले तिहरे सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में मंगलवार को बंबई उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने इस मामले में 65 वर्षीय आरोपी कफील अहमद मोहम्मद अयूब को 13 साल बाद जमानत प्रदान की है। इस भीषण आतंकी हमले में 27 लोगों की जान गई थी और 120 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने अयूब को एक लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दी। हालांकि विस्तृत आदेश की प्रति अभी जारी नहीं की गई है। अयूब, जो बिहार के निवासी हैं, पिछले 13 वर्षों से मुंबई के केंद्रीय कारागार में बंद हैं। उन्हें फरवरी 2012 में गिरफ्तार किया गया था। उनके वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि अयूब एक दशक से अधिक समय से जेल में हैं जबकि मुकदमे की प्रक्रिया अब तक पूर्ण नहीं हो पाई है।
अयूब ने उच्च न्यायालय में विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 2022 में उसे ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने मामले के तथ्यों और अभियोजन की स्थिति पर विचार करने के बाद यह निर्णय सुनाया।
10 जुलाई 2011 को मुंबई में एक के बाद एक तीन धमाकों ने शहर को हिला दिया था। ये विस्फोट महज दस-दस मिनट के अंतराल पर झवेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर में हुए थे। महाराष्ट्र आतंकवाद रोधी दस्ता (एटीएस) ने इस मामले की जांच संभाली थी और दावा किया था कि इन धमाकों की साजिश आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) ने रची थी। एटीएस के अनुसार, इस संगठन का संस्थापक यासीन भटकल इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता था।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि कफील अहमद ने इंडियन मुजाहिदीन के निर्देश पर कई मुस्लिम युवकों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए भड़काया। वहीं, जांच एजेंसी ने यह भी कहा था कि वह भटकल के बेहद नजदीकी संपर्क में था। हालांकि, अपनी याचिका में अयूब ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि वह निर्दोष है और उसे झूठे मामले में फंसाया गया है।
अयूब का यह भी दावा था कि अभियोजन पक्ष के पास उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है, सिवाय उसके स्वयं के इकबालिया बयान के — जिसे उसने दबाव में दिया था, स्वेच्छा से नहीं।
अब जबकि उच्च न्यायालय ने उसे जमानत दे दी है, अयूब की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, इस मामले की कानूनी प्रक्रिया और मुकदमा आगे भी जारी रहेगा। यह फैसला न्याय प्रणाली में लंबे समय से लंबित मामलों पर भी एक बार फिर गंभीर सवाल खड़ा करता है — क्या न्याय में इतनी देरी, अपने आप में एक अन्याय नहीं है?
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