मुंबई में आयोजित IMC Capital Markets Conference के दौरान Securities and Exchange Board of India (सेबी) के चेयरमैन Tuhin Kanta Pandey ने कमोडिटी बाजार से जुड़े GST ढांचे की जटिलताओं पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि नियामक इन मुद्दों के समाधान के लिए सरकार के साथ सक्रिय रूप से संवाद कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेबी ने डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू के समक्ष इन समस्याओं को रखा है और चाहता है कि GST Council इस पर विचार कर व्यावहारिक समाधान निकाले।

पांडेय ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कमोडिटी डेरिवेटिव्स में फिजिकल डिलीवरी के दौरान वेयरहाउस विभिन्न राज्यों में स्थित होने के कारण इंटरमीडियरी को हर राज्य में अलग-अलग GST रजिस्ट्रेशन लेना पड़ता है, जो अत्यंत जटिल और बोझिल प्रक्रिया है। इस स्थिति को सुधारने के लिए सेबी ने स्टेट GST के स्थान पर इंटीग्रेटेड GST (IGST) मैकेनिज्म लागू करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे डिलीवरी प्रक्रिया में एकरूपता आए और अनुपालन सरल हो सके।

उन्होंने बताया कि मौजूदा सिस्टम में एक्सचेंज-आधारित डिलीवरी के लिए भले ही लेनदेन केंद्रीकृत रूप से निष्पादित और सेटल होता है, फिर भी डिलीवरी सेंटर वाले प्रत्येक राज्य में अलग पंजीकरण आवश्यक होता है। इससे राज्य-वार फाइलिंग, मल्टीपल रजिस्ट्रेशन, रिकंसिलिएशन की जटिलताएं और परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऐसी डिलीवरी को इंटर-स्टेट सप्लाई मानकर IGST के तहत लाया जाए, तो टैक्स क्रेडिट का सहज प्रवाह सुनिश्चित होगा और केंद्रीयकृत अनुपालन के साथ गंतव्य राज्यों को राजस्व आवंटन भी सुचारु रूप से हो सकेगा।

SKI Capital के मैनेजिंग डायरेक्टर नरेंद्र वाधवा ने कहा कि GST से जुड़े सुधारों से संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ेगी और गोल्ड जैसी कमोडिटी की डोरस्टेप डिलीवरी के विस्तार के साथ बाजार का लोकतंत्रीकरण संभव होगा। वर्तमान में यदि इंटरमीडियरी संबंधित राज्य में पंजीकृत नहीं है, तो डिलीवरी प्रक्रिया में भारी परेशानी होती है।

संस्थागत निवेशकों की भागीदारी पर पूछे गए सवालों के जवाब में पांडेय ने बताया कि Reserve Bank of India (RBI) और Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) फिलहाल बैंकों और बीमा कंपनियों को कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में प्रवेश देने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अन्य नियामकों के पास इसके पीछे “वैध तर्क” हैं और सेबी को इस विषय पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बीमा क्षेत्र दीर्घकालिक निवेश से जुड़ा है, ऐसे में कमोडिटी डेरिवेटिव्स उसकी जरूरतों के अनुरूप नहीं माने जा रहे।

सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान पांडेय ने उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल्स जैसे ‘Mythos’ से उत्पन्न जोखिमों पर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि सेबी जल्द ही ऐसे AI मॉडल्स और AI-आधारित वल्नरेबिलिटी डिटेक्शन टूल्स से जुड़े खतरों पर एक प्रारंभिक एडवाइजरी जारी करेगा। उन्होंने आगाह किया कि आपस में जुड़े सिक्योरिटीज बाजार में एक कमजोर कड़ी व्यापक जोखिम पैदा कर सकती है, इसलिए रेगुलेटेड एंटिटीज को साइबर रेजिलिएंस और सतत निगरानी को मजबूत करना होगा।

पांडेय ने कहा कि एल्गोरिदम मानव नियंत्रण से तेज गति से काम करते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म धोखाधड़ी के माध्यम बन सकते हैं। जैसे-जैसे अगली पीढ़ी के AI मॉडल अधिक शक्तिशाली हो रहे हैं, ये उपकरण जहां कमजोरियों की पहचान तेज करते हैं, वहीं बड़े पैमाने पर उनका दुरुपयोग भी संभव बनाते हैं।

CKYC 2.0 के संबंध में उन्होंने बताया कि यह ढांचा तैयार किया जा रहा है, जिसमें Central Registry of Securitisation Asset Reconstruction and Security Interest of India (CERSAI) प्रमुख भूमिका निभा रहा है और सभी नियामक इसमें योगदान दे रहे हैं। पिछले सप्ताह CERSAI के साथ बैठक में विभिन्न मुद्दों की पहचान की गई है, जिन पर काम चल रहा है और जुलाई के अंत तक प्रगति की उम्मीद है। उन्होंने CKYC पूल में डेटा ऑथेंटिकेशन की स्पष्टता की कमी को भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया।

सेबी की यह पहल न केवल कमोडिटी बाजार में कर ढांचे को सरल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि AI युग में वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।

Pratahkal Bureau

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