राजस्थान की मंडियों में गेहूं और सरसों की रिकॉर्ड आवक; धान और सोयाबीन के दामों में भारी उछाल
राजस्थान की विभिन्न अनाज मंडियों में गेहूं की रिकॉर्ड आवक दर्ज की गई है, जबकि खुले बाजार में धान और सोयाबीन की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर चल रही हैं।

राजस्थान की एक स्थानीय कृषि मंडी में कटाई सीजन के बाद बिक्री के लिए खुले मैदान में रखे अनाज के ढेर और जूट के बोरों में भरा हुआ गेहूं।
Rajasthan mandi bhav update 2026 : राजस्थान के कृषि व्यापार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिहाज से मई का यह हफ्ता बेहद उतार-चढ़ाव और बड़ी व्यापारिक हलचलों से भरा साबित हो रहा है। मरुधरा की विभिन्न कृषि उपज मंडियों में रबी फसलों की कटाई के बाद अनाज, तिलहन और दलहन की आवक अपने चरम पर पहुंच चुकी है। राज्य विपणन बोर्ड द्वारा जारी तीन दिवसीय आधिकारिक आंकड़ों के बारीक विश्लेषण से पता चलता है कि जहां एक तरफ धान और सरसों जैसी चुनिंदा फसलों के दामों में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ गेहूं, बाजरा और मक्का उगाने वाले किसानों को खुले बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम दाम मिलने के कारण भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। मंडियों में मची इस उठापटक ने न केवल नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि राज्य में सरकारी खरीद केंद्रों की सक्रियता की अनिवार्यता पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
गेहूं की ऐतिहासिक आवक से पटीं राजस्थान की मंडियां, एमएसपी के नीचे रहने को मजबूर हुए दाम :
राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले गेहूं की बात करें तो इस समय मंडियों में फसलों का महा-सैलाब उमड़ पड़ा है। केवल तीन दिनों (18 मई से 20 मई 2026) के भीतर राज्य भर की मंडियों में उनतालीस हजार मीट्रिक टन से अधिक गेहूं की बंपर आवक दर्ज की गई है। सर्वाधिक आवक 20 मई को चौदह हजार दो सौ तिरपन मीट्रिक टन रही। हालांकि, इस रिकॉर्ड आवक का सीधा और नकारात्मक असर खुले बाजार की कीमतों पर पड़ा है। केंद्र सरकार द्वारा विपणन वर्ष 2026-27 के लिए तय किए गए ₹2,585 प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुकाबले व्यापारियों ने बाजार में इसे महज ₹2,549.79 की औसत दर पर खरीदा। 19 मई को तो स्थिति और भी चिंताजनक हो गई थी जब गेहूं के दाम गिरकर ₹2,497.02 प्रति क्विंटल के स्तर पर आ गए थे, जो एमएसपी से करीब ₹88 प्रति क्विंटल कम है।
बाजरा और मक्का उगाने वाले किसानों को भारी घाटा, धान और सोयाबीन ने बाजार में मारी बाजी :
इस सीजन में सबसे ज्यादा मार मोटे अनाजों की खेती करने वाले किसानों पर पड़ी है। सरकार ने बाजरे का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹2,775 प्रति क्विंटल घोषित किया हुआ है, लेकिन खुले बाजार में खरीदार न मिलने से किसानों को अपनी उपज ₹2,030.03 प्रति क्विंटल की बेहद मामूली दर पर बेचनी पड़ रही है। इसी तरह ₹2,400 के एमएसपी वाले मक्के को व्यापारियों ने ₹1,893.72 प्रति क्विंटल पर समेट दिया। इसके ठीक विपरीत, धान (पैडी) के बाजार में भारी सट्टेबाजी और मजबूत मांग के चलते बंपर मुनाफा देखा जा रहा है। ₹2,369 के समर्थन मूल्य के मुकाबले धान खुले बाजार में ₹3,375 से लेकर ₹3,841 प्रति क्विंटल के उच्चतम स्तर पर कारोबार कर रहा है। जौ (बारले) भी ₹2,150 के सरकारी मूल्य की तुलना में ₹2,198.46 प्रति क्विंटल पर स्थिर बना हुआ है।
तिलहन बाजार में सरसों और सोयाबीन चमके, दलहन में चना और उड़द की कीमतों में आई भारी गिरावट :
तिलहनी फसलों के मोर्चे पर राजस्थान के किसानों के लिए अच्छी और राहत भरी खबर है। राज्य की प्रमुख नकदी फसल सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹6,200 प्रति क्विंटल है, जबकि मजबूत मांग के कारण मंडियों में यह ₹7,334.61 प्रति क्विंटल के भाव पर बिका है। तीन दिनों में कुल छह हजार आठ सौ मीट्रिक टन से अधिक सरसों की आवक हुई है। सोयाबीन भी ₹5,328 के एमएसपी को बहुत पीछे छोड़ते हुए ₹7,020.81 प्रति क्विंटल के शानदार स्तर पर कारोबार कर रहा है और मूंगफली भी ₹8,087.21 प्रति क्विंटल पर मजबूत बनी हुई है। इसके विपरीत दलहन (दालों) के बाजार में मायूसी का माहौल है। चना (बेंगल ग्राम) ₹5,875 के समर्थन मूल्य के मुकाबले ₹5,407.67 प्रति क्विंटल पर बंद हुआ, तो वहीं उड़द (ब्लैक ग्राम) की स्थिति सबसे दयनीय रही, जहाँ ₹7,800 के सरकारी एमएसपी के सामने किसानों को सिर्फ ₹5,525.31 प्रति क्विंटल की दर से ही संतोष करना पड़ा।
बाजार के इस रुख का आगामी कृषि सत्र और नीतिगत निर्णयों पर व्यापक असर :
खुले बाजार की इस उठापटक ने राज्य में सरकारी खरीद और एमएसपी गारंटी कानून की प्रासंगिकता को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। कृषि विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अगर गेहूं, बाजरा और उड़द जैसी मुख्य फसलों के दाम सीजन के पीक पर एमएसपी से नीचे बने रहते हैं, तो इससे छोटे और सीमांत किसानों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर सीधा और विपरीत असर पड़ेगा। सरकार द्वारा समय रहते खरीद केंद्रों की संख्या न बढ़ाए जाने और समय पर हस्तक्षेप न करने से व्यापारियों की मोनोपॉली बढ़ती दिख रही है। आगामी खरीफ सीजन की बुआई से ठीक पहले ग्रामीण इलाकों में नकदी का यह संकट आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र में व्यापक असंतोष की वजह बन सकता है, जिसे रोकने के लिए नीतिगत स्तर पर त्वरित और कड़े फैसलों की तत्काल आवश्यकता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
