लातूर।

महाराष्ट्र के लातूर जिले में समय अमावस्या के अवसर पर एक बार फिर किसान परंपरा और लोकसंस्कृति का भव्य दृश्य देखने को मिला। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी किसानों ने अपने खेतों में पारंपरिक रानभोजन का आयोजन कर मिट्टी, मेहनत और संस्कृति के साथ अपने गहरे रिश्ते को सजीव कर दिया। शहर की हलचल से दूर खेतों में उमड़ी यह भीड़, ग्रामीण जीवन की आत्मा को उजागर करती नजर आई।

समय अमावस्या के दिन सुबह से ही लातूर जिले के विभिन्न गांवों में खेतों की ओर लोगों का रुख दिखाई दिया। ‘व्हलगे-व्हलगे सालम पलगे’ के पारंपरिक जयघोष के साथ किसान परिवार खेतों में एकत्र हुए। भजियों की खुशबू, आंबील की मिठास, आंबट भात की खटास और बाजरा-ज्वार की भाकरी की सादगी ने पूरे वातावरण को लोकस्वाद से भर दिया। कोंदिची गोड पोळी, घेव्याची खीर, गोड भात, चपाती और कर्नाटक शैली की कड़क भाकर जैसे पारंपरिक व्यंजन इस रानभोजन का विशेष आकर्षण रहे।

इस दिन शहर अपेक्षाकृत शांत नजर आया, जबकि खेतों में उत्सव जैसा माहौल बना रहा। परिवार, रिश्तेदार और मित्र एक साथ खेतों में बैठकर भोजन करते दिखे। खुले आकाश के नीचे, अपनी ही उगाई फसल के बीच बैठकर किया गया यह भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भूमि के प्रति कृतज्ञता और सामूहिकता की भावना का प्रतीक बना।





स्थानीय स्तर पर समय अमावस्या को केवल धार्मिक या पारंपरिक तिथि नहीं, बल्कि किसान जीवन से जुड़ा एक सांस्कृतिक पर्व माना जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जो नई पीढ़ी को भी खेती, जमीन और ग्रामीण मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। प्रशासनिक या कानूनी पहलू न होने के बावजूद, यह आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

समय अमावस्या का यह रानभोजन लातूर जिले में किसान जीवन की पहचान बन चुका है। यह पर्व यह संदेश देता है कि आधुनिकता के दौर में भी लोकपरंपराएं जीवित हैं और किसान संस्कृति आज भी समाज की जड़ों को मजबूती प्रदान कर रही है।

Pratahkal Newsroom

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