क्या था सुप्रिया सुले और अजित पवार का रिश्ता? क्या सुलह होने से पहले ही अजित पवार को ले गई नियति?
28 जनवरी 2026 को बारामती विमान हादसे में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आकस्मिक निधन हो गया है। इस दुखद घटना ने न केवल राज्य की राजनीति में शून्यता पैदा कर दी है, बल्कि सुप्रिया सुले और उनके बीच चल रहे सत्ता संघर्ष को भी एक अत्यंत भावुक और त्रासदीपूर्ण मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। जानिए कैसे 'दादा' और 'ताई' का रिश्ता राजनीति की भेंट चढ़ा और अब इस दुर्घटना के बाद पवार परिवार की विरासत और अधूरी सुलह की कहानी किस दिशा में जाएगी।

भारतीय राजनीति, विशेषकर महाराष्ट्र के सियासी गलियारों के लिए 28 जनवरी 2026 की तारीख एक कभी न भरने वाले जख्म के रूप में दर्ज हो गई है। बारामती में हुए एक भीषण विमान हादसे ने राज्य के उपमुख्यमंत्री और कद्दावर नेता अजित पवार को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया है। इस हृदयविदारक घटना ने न केवल महाराष्ट्र की राजनीति में एक भारी शून्यता पैदा कर दी है, बल्कि पवार परिवार के भीतर चल रहे उस राजनीतिक और पारिवारिक द्वंद्व को भी एक स्तब्धकारी विराम दे दिया है, जिसने पिछले कुछ वर्षों से पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच रखा था। सुप्रिया सुले और अजित पवार के बीच का रिश्ता, जो कभी स्नेह और सुरक्षा की मिसाल था, अंततः नियति के क्रूर हाथों में एक अधूरी कहानी बनकर रह गया है।
अजित पवार और सुप्रिया सुले का रिश्ता मात्र चचेरे भाई-बहन का नहीं था, बल्कि यह पवार परिवार की राजनीतिक विरासत के दो मजबूत स्तंभों का संगम था। एनसीपी प्रमुख शरद पवार की बेटी सुप्रिया और उनके बड़े भाई अनंतराव पवार के बेटे अजित के बीच, राजनीतिक दरार आने से पूर्व, अगाध स्नेह था। अजित पवार, जिन्हें परिवार और समर्थक प्यार से 'दादा' कहते थे, सुप्रिया के लिए एक बड़े भाई होने के साथ-साथ उनके रक्षक भी माने जाते थे। दशकों तक यह परिवार 'एक ध्वज, एक पार्टी' के सिद्धांत पर चला, जहाँ एक अघोषित समझौते के तहत राज्य की कमान अजित पवार के पास और दिल्ली की राजनीति का दायित्व सुप्रिया सुले के कंधों पर था।
किंतु, सत्ता की महत्वाकांक्षा अक्सर खून के रिश्तों पर भारी पड़ती है, और पवार परिवार भी इससे अछूता नहीं रहा। जुलाई 2023 में जब अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर एनसीपी को तोड़ा और भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल हुए, तो यह केवल एक पार्टी का विभाजन नहीं, बल्कि एक परिवार का विखंडन था। निर्वाचन आयोग से असली एनसीपी का नाम और चुनाव चिन्ह 'घड़ी' हासिल करने के बाद, अजित पवार के सामने अपनी राजनीतिक वैधता सिद्ध करने की चुनौती थी। इसी जद्दोजहद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बारामती सीट को एक कुरुक्षेत्र में बदल दिया, जहाँ अजित पवार ने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को अपनी ही बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ मैदान में उतार दिया। यह लड़ाई 'ननद बनाम भाभी' के रूप में प्रचारित हुई, लेकिन वास्तव में यह भविष्य के नेतृत्व और पवार विरासत पर वर्चस्व की जंग थी।
इस राजनीतिक महाभारत ने पारिवारिक रिश्तों में गहरी कड़वाहट घोल दी थी। अजित पवार यह साबित करना चाहते थे कि बारामती अब शरद पवार का नहीं, बल्कि उनका गढ़ है, जबकि सुप्रिया सुले अपने पिता की विरासत को बचाने के लिए संघर्षरत थीं। अंततः, बारामती की जनता ने सुप्रिया सुले के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन उस चुनाव के दौरान पैदा हुई खटास ने भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को धुंधला कर दिया था। विडंबना देखिए कि जब पिछले कुछ महीनों से दोनों गुटों के बीच सुलह की सुगबुगाहट तेज थी और यह कयास लगाए जा रहे थे कि शायद यह परिवार पुनः एक हो सकता है, तभी काल ने अपना क्रूर चक्र चलाया।
अजित पवार का इस तरह अचानक चले जाना बारामती की जनता और उनके समर्थकों के लिए वज्रपात समान है। जिस विवाद ने परिवार को दो ध्रुवों में बांट दिया था, उसकी परिणति इतनी दुखद होगी, इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। आज, जब बारामती का आसमान खामोश है, तो यह विवाद "सत्ता की जंग" के रूप में नहीं, बल्कि "एक अधूरे रिश्ते की त्रासदी" के रूप में देखा जा रहा है। एक महान राजनीतिक योद्धा का अंत उस समय हुआ जब संभवतः वह अपने परिवार के साथ दोबारा जुड़ने की राह देख रहे थे। अजित पवार का निधन न केवल एक पार्टी के नेता का जाना है, बल्कि यह उस संभावना का भी अंत है, जिसमें भाई और बहन के रिश्तों की डोर फिर से बंध सकती थी। राजनीति चलती रहेगी, लेकिन बारामती ने आज अपना 'दादा' और सुप्रिया सुले ने अपना वह भाई खो दिया है, जो कभी उनका सबसे बड़ा अभिमान था।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
