दिवाली पर आज भी कायम है पारंपरिक केरसुणी की मांग, सिंधी के पेड़ों की कमी से कारीगरों का रोजगार संकट गहराया
दिवाली पर लक्ष्मी का प्रतीक मानी जाने वाली पारंपरिक केरसुणी की खरीदारी आज भी जारी है। लेकिन सिंधी के पेड़ों की कमी, आधुनिक झाड़ुओं के बढ़ते इस्तेमाल और निर्माण सामग्री महंगी होने से त-हाडी के ग्रामीण कारीगरों का रोजगार प्रभावित हो रहा है।

तस्वीर में महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्र में सिंधी के पत्तों से पारंपरिक केरसुणी (झाड़ू) तैयार करतीं महिला कारीगर और सड़क के किनारे रखे झाड़ू दिखाई दे रही हैं।
महाराष्ट्र के त-हाडी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक और बाजार में उपलब्ध नए प्रकार के झाड़ुओं के बढ़ते चलन के बावजूद दिवाली के अवसर पर पारंपरिक केरसुणी (झाड़ू) की मांग बनी हुई है। सिंधी के पेड़ों की पत्तियों से तैयार होने वाली इस केरसुणी को ग्रामीण क्षेत्रों में लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि लक्ष्मी पूजन के लिए आज भी इसकी विशेष रूप से खरीदारी की जाती है।
आधुनिक युग में गृहिणियां सफाई के लिए बाजार में उपलब्ध नए प्रकार के उपकरणों और झाड़ुओं को प्राथमिकता दे रही हैं, लेकिन दिवाली के दौरान पारंपरिक फड़ाफड़ी यानी केरसुणी का महत्व बरकरार रहता है। अमीरों से लेकर झोपड़ियों में रहने वाले गरीब परिवारों तक, सभी लोग दिवाली पर इसकी खरीदारी करते हैं। इसके चलते त्योहार के मौसम में केरसुणी बनाने वाले कारीगरों और विक्रेताओं को रोजगार मिलता है।
हालांकि, साल के अन्य दिनों में आधुनिक झाड़ुओं के बढ़ते इस्तेमाल के कारण पारंपरिक केरसुणी की मांग काफी कम हो गई है। पहले लगभग हर घर में सिंधी के पत्तों से बनी झाड़ू का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब यांत्रिक युग में इसका चलन लगातार घट रहा है। इसका सीधा असर ग्रामीण कारीगरों के रोजगार पर पड़ा है। बाजार में नए प्रकार की केरसुणियों ने ग्राहकों के बीच अपनी जगह बना ली है, जिससे पारंपरिक झाड़ू बनाने वालों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
क्षेत्र के वरुळ, जळोद, अर्थे, वघाडी और त-हाडी सहित अंतुली में पहले से सिंधी के पेड़ों की पत्तियों से झाड़ू बनाने का पारंपरिक व्यवसाय चलता था। हालांकि, अब सिंधी के पेड़ों की संख्या लगातार कम हो रही है। पेड़ों की कमी के कारण उनकी पत्तियां यानी पनोलियां मिलना भी मुश्किल हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी केरसुणी का धार्मिक और घरेलू महत्व है, लेकिन कच्चे माल की कमी के चलते इस व्यवसाय से जुड़े कारीगरों की संख्या अब गिनती के रह गई है। पारंपरिक केरसुणी निर्माण का व्यवसाय धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।
इस व्यवसाय से जुड़े कारीगरों की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि सरकार की ओर से भी इस पारंपरिक व्यवसाय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कभी घर-घर में इस्तेमाल होने वाली और लक्ष्मी के रूप में पूजी जाने वाली केरसुणी अब धीरे-धीरे चलन से बाहर होती जा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी केरसुणी घर लाने के बाद उस पर हल्दी-कुमकुम लगाकर पूजा करने की परंपरा कायम है। इसे लक्ष्मी का प्रतीक मानकर विशेष रूप से दिवाली के लक्ष्मी पूजन के लिए खरीदा जाता है। हालांकि, बाकी दिनों में आधुनिक झाड़ुओं का इस्तेमाल होने से पारंपरिक केरसुणी के कारोबार पर असर पड़ा है।
झाड़ू विक्रेता रत्नाबाई ईशी ने बताया कि दिवाली के दौरान केरसुणी की मांग रहती है, लेकिन वर्ष के अन्य दिनों में आधुनिक झाड़ुओं के इस्तेमाल के कारण उनके व्यवसाय की स्थिति कमजोर हो गई है।
कारीगर रत्नाबाई ईशी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिस झाड़ू की पूजा की जाती है, उसका पूरे साल घरों में इस्तेमाल भी होता है। पिछले वर्ष एक झाड़ू की कीमत 50 से 70 रुपये थी और इस वर्ष भी यही दर बनी हुई है। हालांकि, केरसुणी बनाने में इस्तेमाल होने वाली रस्सी और अन्य सामग्री के दाम बढ़ गए हैं। इसके कारण पिछले वर्षों की तुलना में इस बार के मौसम में मुनाफा प्रभावित हुआ है और कारीगरों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सिंधी के पेड़ों की घटती संख्या, कच्चे माल की बढ़ती कमी और आधुनिक झाड़ुओं के बढ़ते इस्तेमाल ने पारंपरिक केरसुणी निर्माण से जुड़े ग्रामीण कारीगरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा कर दिया है। दिवाली पर धार्मिक परंपरा के चलते इसकी मांग बनी हुई है, लेकिन बाकी समय कारोबार के कमजोर रहने से यह पारंपरिक हस्तकला अस्तित्व बचाने के संघर्ष से गुजर रही है।

