लातूर के राजनीति इतिहास का एक शुद्ध, सुसंस्कृत और निष्कलंक अध्याय बुधवार को सदा के लिए बंद हो गया। नगराध्यक्ष से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री और पंजाब के राज्यपाल तक की अद्वितीय राजनीतिक यात्रा करने वाले वरिष्ठ नेता शिवराज पाटील चाकूरकर का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। छह दशकों से अधिक समय तक लातूर और देश की राजनीति के केंद्र में रहे चाकूरकर अपनी स्वच्छ छवि, उत्कृष्ट वक्तृत्व, सर्वधर्म समभाव और मर्यादित नेतृत्व के लिए पहचाने जाते थे।

परिवार के एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए वे दिल्ली से लातूर पहुंचे थे। आगमन के कुछ समय बाद ही अचानक अशक्तता और स्वास्थ्य गिरावट शुरू हुई। उन्हें लातूर के देवघर स्थित निजी निवास पर ही डॉक्टर्स की टीम की देखरेख में उपचार दिया जा रहा था। 5 दिसंबर से उनकी स्थिति और बिगड़ने लगी तथा भोजन–जल लेना भी उन्होंने बंद कर दिया था। हालात गंभीर होते ही एयर एंबुलेंस से दिल्ली स्थानांतरित करने की तैयारी की गई, किंतु डॉक्टरों ने जोखिम अधिक होने के कारण ऐसा न करने की सलाह दी। अंततः उपचार जारी रहने के दौरान आज सुबह उनका निधन हो गया।

शिवराज पाटील चाकूरकर की राजनीतिक यात्रा 1967 में लातूर के नगराध्यक्ष पद से शुरू हुई और 2004 तक आमदार, लोकसभा अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री तथा अंततः पंजाब के राज्यपाल के रूप में सुशोभित रही। अपने छह दशक लंबे सार्वजनिक जीवन में उन पर कभी भी भ्रष्टाचार, जातीय राजनीति या निजी लाभ के आरोप नहीं लगे। वे लिंगायत समाज से आते हुए भी किसी विशेष वर्ग के नेता के रूप में सीमित नहीं रहे। लातूर से लेकर मुंबई और दिल्ली तक उन्होंने सर्वसमावेशक नेतृत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, यही कारण था कि मुस्लिम समाज से लेकर ग्रामीण और शहरी समुदायों में भी उनका विशेष सम्मान था।





चाकूरकर की राजनीतिक भूमिका में कई महत्वपूर्ण निर्णय शामिल थे, जिनका श्रेय उन्होंने कभी स्वयं नहीं लिया। लातूर–मुंबई रेल परियोजना के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया हो या मांजरा सहकारी साखर कारखाने की अनुमति, वे कई ऐसे कार्यों के अनसुने शिल्पकार रहे। उनके समीपस्थ लोग बताते हैं कि उन्होंने कभी किसी का विरोध, कटाक्ष या निजी टीका नहीं की, यहां तक कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा किए गए नुकसान या चुनौतियों पर भी उन्होंने मौन और मर्यादित व्यवहार को ही अपनाया।

2004 की लोकसभा हार के बाद उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। सार्वजनिक मंचों से दूरी बनाकर अपने अध्ययन, लेखन और सामाजिक संवाद में अधिक समय दिया। अंत तक वे गहन अध्ययन, सुदृढ़ वक्तृत्व और सादगी पूर्ण जीवन के लिए जाने जाते रहे। उनके निधन से लातूर, महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसी रिक्तता उत्पन्न हुई है जिसकी भरपाई लंबे समय तक संभव नहीं होगी।

Pratahkal Newsroom

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