मुंबई से अयोध्या तक का वो सफर: कैसे एक कार्टूनिस्ट बना 'हिंदू हृदय सम्राट' और बदल दी भारत की राजनीति?
बालासाहेब ठाकरे: मुंबई की राजनीति का वो नायक जिसने बाबरी विध्वंस की जिम्मेदारी लेकर भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी थी। जानिए कैसे एक कार्टूनिस्ट 'हिंदू हृदय सम्राट' बना और अयोध्या आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही। पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।

मुंबई/अयोध्या: आधुनिक भारतीय राजनीति के पटल पर एक ऐसा नाम, जिसकी दहाड़ से कभी देश की आर्थिक राजधानी थम जाया करती थी और जिसके कार्टूनों की स्याही सत्ता के गलियारों में खलबली मचा देती थी— वो नाम है बाल केशव ठाकरे, जिन्हें दुनिया बालासाहेब ठाकरे के नाम से जानती है। प्रखर वक्ता, तीखे व्यंग्यकार और कट्टर विचारधारा के प्रतीक ठाकरे का जीवन जितना प्रभावशाली रहा, उतना ही विवादों के साये में भी रहा। विशेष रूप से 6 दिसंबर 1992 की वो ऐतिहासिक तारीख, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी, बालासाहेब के नाम के बिना अधूरी मानी जाती है।
कार्टूनिस्ट से 'हिंदू हृदय सम्राट' तक का सफर
23 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र में जन्मे बालासाहेब ने अपने करियर की शुरुआत एक कार्टूनिस्ट के रूप में की थी, लेकिन 1966 में शिवसेना की स्थापना ने उन्हें 'मराठी मानुस' का मसीहा बना दिया। समय के साथ उनकी राजनीति का फलक विस्तृत हुआ और वे कट्टर हिंदुत्व के सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे। बिना किसी संवैधानिक पद पर रहे, बालासाहेब का प्रभाव किसी मुख्यमंत्री या मंत्री से कहीं अधिक था। उनकी एक आवाज पर मुंबई की सड़कें या तो वीरान हो जाती थीं या समर्थकों के सैलाब से भर जाती थीं।
बाबरी विध्वंस और ठाकरे की वो बेबाक स्वीकारोक्ति
राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया गया, तो देश के बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज रक्षात्मक मुद्रा में थे। लेकिन मातोश्री के इस शेर ने पूरी दुनिया के सामने सीना ठोककर कहा था, "अगर बाबरी मस्जिद गिराने वाले मेरे शिवसैनिक हैं, तो मुझे उन पर गर्व है।" उन्होंने इस घटना को केवल एक ढांचे का गिरना नहीं, बल्कि हिंदू अस्मिता की विजय बताया था। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे जैसे नेताओं ने भी बाद में कई मौकों पर दोहराया कि उस समय जब कई भाजपा नेता जिम्मेदारी लेने से बच रहे थे, तब बालासाहेब ने आगे बढ़कर अपने कार्यकर्ताओं का साथ दिया था।
कानूनी शिकंजा और लिब्रहान आयोग की जांच
इस घटना के बाद देश भर में मचे सांप्रदायिक बवाल और कानूनी कार्रवाई की जद में बालासाहेब ठाकरे भी आए। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में साजिश और उकसावे के आरोपों के तहत जिन 68 लोगों के नाम शामिल थे, उनमें ठाकरे का नाम प्रमुखता से था। उन पर आपराधिक साजिश और नफरत फैलाने के गंभीर आरोप लगे। हालांकि, लंबे समय तक चली इस कानूनी लड़ाई और जांच के बावजूद, उन्हें कभी सजा नहीं सुनाई जा सकी। 17 नवंबर 2012 को उनके निधन के साथ ही उनके खिलाफ चल रहे कई कानूनी अध्याय भी बंद हो गए।
एक अमिट विरासत और राजनीतिक प्रभाव
बालासाहेब ठाकरे का बाबरी मामले से जुड़ाव केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत का एक अटूट हिस्सा बन गया। उनके इस रुख ने उन्हें 'हिंदू हृदय सम्राट' की उपाधि दिलाई। आज भी जब अयोध्या और हिंदुत्व की चर्चा होती है, तो कल्याण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ बालासाहेब का नाम अनिवार्य रूप से लिया जाता है। उनकी स्पष्टवादिता ने जहां उन्हें करोड़ों समर्थकों का चहेता बनाया, वहीं आलोचकों की नजर में वे हमेशा ध्रुवीकरण की राजनीति के केंद्र रहे। आज उनकी अनुपस्थिति में भी शिवसेना की राजनीति और हिंदुत्व का विमर्श उनके उसी कड़े रुख की छाया में फलता-फूलता नजर आता है।

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