शिरपुर में सामान्य नागरिकों के लिए उपलब्ध सस्त्या मोबाइल योजनाओं और सरकारी कर्मचारी, अधिकारी तथा लोकप्रतिनिधियों को मिलने वाली मोबाइल अथवा दूरध्वनी सुविधाओं के खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं। निजी कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सामान्य ग्राहकों को कुछ सौ रुपये में अनलिमिटेड कॉलिंग, बड़ी मात्रा में डेटा और एसएमएस की सुविधा मिल रही है। इसके बावजूद सरकारी यंत्रणा में कुछ पदों के लिए मोबाइल अथवा दूरध्वनी सुविधेवर दरमहा हजारो रुपये खर्च करने की पद्धत अद्याप अनेक ठिकाणी कायम असल्याने सार्वजनिक पैशाच्या वापराबाबत प्रश्न उपस्थित होत आहेत।

वर्तमान बाजार में उपलब्ध योजनाओं पर नजर डालने पर यह अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, एयरटेल की उपलब्ध योजनाओं में 299 रुपये में 28 दिनों के लिए प्रतिदिन 1 जीबी डेटा और अनलिमिटेड कॉलिंग, जबकि 349 रुपये में प्रतिदिन 1.5 जीबी डेटा और अनलिमिटेड कॉलिंग की सुविधा उपलब्ध होने की जानकारी कंपनी ने दी है। वीआई की योजनाओं में भी 299 रुपये में प्रतिदिन 1 जीबी डेटा के साथ 28 दिनों की सुविधा है, जबकि कंपनी की कुछ 'नॉनस्टॉप' योजनाओं में अनलिमिटेड डेटा और कॉलिंग की सुविधा उपलब्ध है।

जियो की ओर से भी 349 रुपये या उससे अधिक कीमत वाली पात्र योजना में प्रतिदिन 2 जीबी डेटा के साथ 5G क्षेत्र में अनलिमिटेड 5G डेटा उपलब्ध होने की जानकारी दी जाती है। ऐसे में सरकारी मोबाइल खर्च का पुनर्विचार कब होगा, यह सवाल उठ रहा है।

सामान्य नागरिक अपने खर्च से हर महीने कुछ सौ रुपये में मोबाइल सेवा का उपयोग कर रहे हैं, जबकि सरकारी व्यवस्था में कुछ पदों के लिए दूरध्वनी अथवा मोबाइल सुविधा पर हजारों रुपये खर्च करने की आवश्यकता कितनी है, यह मूल प्रश्न है। खासकर कॉलिंग और इंटरनेट का खर्च तकनीक के कारण काफी कम हो चुका है। ऐसे में पुराने तरीके के दूरध्वनी भत्ते अथवा बिल की सीमाएं आज भी उसी रूप में बनाए रखने की आवश्यकता है या नहीं, इसका शासन की ओर से आकलन किए जाने की जरूरत है।

महाराष्ट्र विधानमंडल की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, आमदारों के लिए दूरध्वनी सुविधा के लिए हर महीने 8,000 रुपये देने का प्रावधान है। यह राशि प्रत्यक्ष दूरध्वनी सुविधा उपलब्ध कराई गई हो या सदस्य ने अपने खर्च से दूरध्वनी लगवाया हो, दोनों स्थितियों में देय होने की जानकारी दी गई है।

सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों के लिए पद के अनुसार उपलब्ध मोबाइल अथवा दूरध्वनी सुविधाओं के नियम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को हजारों रुपये का बिल अथवा भत्ता मिलता है, ऐसा सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हालांकि, जहां वास्तविक उपयोग की तुलना में अधिक सीमाएं मंजूर हैं, वहां उनके पुनर्विचार का समय आ गया है, यह सवाल नागरिकों की ओर से उठाया जा सकता है।

आज सामान्य नागरिक को अपनी आय से मोबाइल रिचार्ज कराना पड़ता है। महंगाई, घरेलू खर्च और बढ़ते दैनिक खर्चों के बीच वह 300-400 रुपये की योजनाओं में अपना काम चला रहा है। दूसरी ओर, यदि सार्वजनिक निधि से मोबाइल सुविधा उपलब्ध कराई जाती है तो उसके पीछे 'जरूरत कितनी और खर्च कितना?' इसका स्पष्ट उत्तर होना आवश्यक है।

मोबाइल कंपनियां आज अनलिमिटेड कॉलिंग, डेटा, 5G और विभिन्न डिजिटल सुविधाएं कुछ सौ रुपये में उपलब्ध करा रही हैं। ऐसे में सरकारी मोबाइल खर्च से जुड़े पुराने नियमों का महंगाई सूचकांक, वास्तविक उपयोग और वर्तमान बाजार दरों के आधार पर पुनर्मूल्यांकन करने की मांग सामने आ रही है।

सरकारी कार्यालयों में बड़े पैमाने पर मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल काम का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, इसके लिए उचित सीमा, अधिकृत प्लान, वास्तविक बिल की जांच और डिजिटल ऑडिट जैसी व्यवस्था हो तो सार्वजनिक निधि के अपव्यय को रोकने में मदद मिल सकती है। ऐसे में तकनीक और मोबाइल सेवाओं की बदलती लागत के बीच सरकारी मोबाइल खर्च की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और पारदर्शिता का सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है।

Pratahkal Bureau

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