लातूर की माटी ने उस नेता को खो दिया, जिसने न केवल जिले का नाम राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित किया, बल्कि भारतीय राजनीति में सुसंस्कृत, संयमी और निष्कलंक नेतृत्व की एक मिसाल कायम की। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और पंजाब के राज्यपाल रहे शिवराज पाटिल चाकूरकर का शुक्रवार 12 दिसंबर की सुबह 6:30 बजे 91 वर्ष की आयु में उनके देवघर स्थित निवास पर निधन हो गया। लातूर से दिल्ली तक छह दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहे इस सम्मानित नेता के देहावसान ने महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ा दी है।

वे कुछ दिनों से अपने परिवार में आयोजित विवाह समारोह हेतु दिल्ली से लातूर आए हुए थे। आगमन के तुरंत बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और डॉक्टरों की टीम लगातार उपचार में जुटी रही। उन्हें दिल्ली शिफ्ट करने के लिए एयर एम्बुलेंस भी तैयार की गई, लेकिन चिकित्सकों ने जोखिम बताते हुए इसे स्थगित कर दिया। अंततः शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही देवघर स्थित आवास पर जनप्रतिनिधियों और समर्थकों का तांता लग गया।

पूर्व मंत्री दिलीपराव देशमुख, विधायक अमित देशमुख और विधायक संभाजी पाटिल निलंगेकर ने पहुंचकर नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित की। लातूर के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस वरिष्ठ नेता को आज 13 दिसंबर को सुबह 11 बजे लातूर के एमआईडीसी के समीप वरवंटी क्षेत्र में शासकीय इतमा के तहत अंतिम संस्कार दिया जाएगा। दोपहर में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और पशुसंवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने भी उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें विदाई दी।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि देश ने एक सुसंस्कृत, शांत, उच्च नैतिक मूल्य वाला और मर्यादित राजनीतिक नेतृत्व खो दिया है। उन्होंने स्मरण किया कि चाकूरकर की कार्यशैली, अध्ययनशीलता और उनके संतुलित नेतृत्व ने महाराष्ट्र की राजकीय परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नई प्रतिष्ठा प्रदान की। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि चाकूरकर जैसे नेता राजनीति में शुचिता, शालीनता और संतुलन के सर्वोत्तम उदाहरण थे।

पूर्व मंत्री व सहकार महर्षि दिलीपराव देशमुख ने भी उन्हें भारतीय राजनीति का सिद्धांतनिष्ठ और संयमी नेतृत्व बताते हुए कहा कि उनके विचार आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।

शिवराज पाटिल चाकूरकर की राजनीतिक यात्रा लगभग पाँच दशकों से अधिक लंबी रही—एक ऐसा सफर, जिसमें कभी कोई विवाद, आरोप या भ्रष्टाचार का धब्बा नहीं लगा। 1966 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत नगराध्यक्ष लातूर के तौर पर करने वाले चाकूरकर ने विधायक, विधानसभा उपाध्यक्ष, लोकसभा अध्यक्ष और केंद्र के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का दायित्व संभाला। 2004 से 2008 तक वे देश के केंद्रीय गृहमंत्री रहे और 2010 से 2015 तक पंजाब के राज्यपाल पद पर कार्यरत रहे।

लिंगायत समुदाय से होने के बावजूद उन्होंने कभी जातीय राजनीति नहीं की। गांधी परिवार के निकट होते हुए भी गुटबाजी से कोसों दूर रहे। 1991 और 2004 में राजनीतिक विरोधियों की रणनीति के बावजूद उन्होंने कभी कटु टिप्पणी नहीं की। उनका संयम और विनम्रता राजनीति में दुर्लभ गुण माने जाते रहे।

लातूर में सीआरपीएफ और बीएसएफ प्रशिक्षण इकाइयों की स्थापना से लेकर लातूर–मुंबई रेलमार्ग, मांजरा साखर कारखाना और अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने कभी अपने कार्य का श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। यही उनकी सादगी और सेवा-भाव का परिचायक था।

उनके व्यक्तित्व के शांत स्वभाव, सर्वधर्म समभाव की भावना, मराठी–हिंदी–अंग्रेजी पर असाधारण पकड़, प्रभावी वकृत्व और गहन अध्ययनशीलता ने उन्हें एक अद्वितीय नेता का स्थान दिया। उनके निधन से लातूर, मराठवाड़ा और देश की राजनीति में एक ऐसी रिक्तता बनी है, जिसकी पूर्ति संभवतः लंबे समय तक नहीं हो सकेगी।

उनके पीछे पुत्र शैलेश पाटिल, पुत्रवधू अर्चना पाटिल और दो नातिनें हैं। अंतिम दर्शन के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भी उपस्थित रहने की संभावना है। शिवराज पाटिल चाकूरकर की सादगी, समर्पण और मूल्यनिष्ठ कार्यशैली सदैव राजनीति के आदर्श के रूप में स्मरण में रहेगी।

Pratahkal Newsroom

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