: कोल्हापूर जिले के मुरगूड ग्रामीण अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का एक चिंताजनक पहलू सामने आया है। अस्पताल के लिए शासन द्वारा उपलब्ध कराई गई अत्याधुनिक सोनोग्राफी मशीन पिछले छह महीनों से उपयोग की प्रतीक्षा में सीलबंद पड़ी है। विशेषज्ञ रेडिओलॉजिस्ट की अनुपलब्धता के कारण यह मशीन महज एक शो-पीस बनकर रह गई है, जिससे स्थानीय गरीब मरीजों को उपचार के लिए भारी आर्थिक संकट और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने के सरकारी दावों के विपरीत, मुरगूड ग्रामीण अस्पताल की यह स्थिति व्यवस्था की उदासीनता को उजागर करती है। लगभग छह माह पूर्व प्राप्त हुई यह सोनोग्राफी मशीन तकनीकी विशेषज्ञता के अभाव में चालू नहीं हो सकी है। सोनोग्राफी करने हेतु पात्र रेडिओलॉजिस्ट की नियुक्ति न होना इस पूरी विफलता का मुख्य कारण माना जा रहा है। इसका सीधा परिणाम उन गरीब मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें छोटी सी जांच के लिए निजी निदान केंद्रों का रुख करना पड़ता है, जहाँ उन्हें अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि मशीन उपलब्ध होने के बावजूद उसका उपयोग न होना "असून अडचण, नसून खोळंबा" जैसी स्थिति पैदा कर रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोल्हापूर जिले में ही योग्य रेडिओलॉजिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है। वर्तमान में केवल कोल्हापूर स्थित जिला सेवा अस्पताल, बावडा में ही ये सेवाएं सुचारू हैं, जबकि अन्य सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा नगण्य है। इस गंभीर समस्या को देखते हुए स्थानीय नागरिकों ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और पालक मंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि जल्द से जल्द विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की जा सके और मरीजों को राहत मिल सके।

इस संकट का एक और भयावह पहलू 'जननी सुरक्षा योजना' का ठप पड़ना है। इस योजना के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को नौ महीने के अंतराल में एक बार निःशुल्क सोनोग्राफी का लाभ मिलता है। इसके लिए निजी सोनोग्राफी केंद्रों को प्रति मरीज ४०० रुपये का अनुदान दिया जाता था, जो वर्तमान में शासन स्तर से बंद कर दिया गया है। अनुदान न मिलने के कारण निजी केंद्रों ने भी अब यह सेवा देने से अपने हाथ खींच लिए हैं, जिससे ग्रामीण गर्भवती महिलाओं की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। स्वास्थ्य विभाग के इस प्रशासनिक गतिरोध के कारण जननी सुरक्षा जैसे संवेदनशील कार्यक्रम अब केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, जिसका सीधा खामियाजा समाज के सबसे कमजोर वर्ग को भुगतना पड़ रहा है।

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