लातूर। महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति के रणक्षेत्र लातूर में आज एक ऐसा नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला जिसने कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसका दी है। निलंगा तालुका के तांबाला जिला परिषद समूह में कांग्रेस को उस वक्त गहरा झटका लगा, जब पिछले तीन दिनों से 'लापता' बताई जा रही पार्टी की आधिकारिक उम्मीदवार अंजना सुनील चौधरी ने अचानक प्रकट होकर अपना नामांकन वापस ले लिया। इस अप्रत्याशित कदम ने न केवल कांग्रेस की रणनीतियों को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि पूरे जिले के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

घटनाक्रम की शुरुआत पिछले शनिवार को हुई थी, जब अंजना सुनील चौधरी अचानक 'नॉट-रीचेबल' हो गईं। उनके रहस्यमयी ढंग से गायब होने के बाद कांग्रेस खेमे में हड़कंप मच गया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके उम्मीदवार का 'अपहरण' कर लिया गया है। हालांकि, आज 27 जनवरी को नामांकन वापसी के अंतिम दिन, अंजना चौधरी भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच चुनाव कार्यालय पहुंचीं। उन्होंने सभी कयासों पर विराम लगाते हुए अपना नाम वापस ले लिया, जिससे कांग्रेस के पास अब इस सीट पर कोई आधिकारिक चेहरा नहीं बचा है। तांबाला निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित है, और चुनाव के इस निर्णायक मोड़ पर उम्मीदवार के पीछे हटने से कांग्रेस की स्थिति बेहद नाजुक हो गई है।

सियासी उठापटक का यह सिलसिला केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं रहा। रेणापुर तालुका के पानगांव जिला परिषद समूह में भी भाजपा के भीतर बड़े बदलाव देखने को मिले। भाजपा के घोषित उम्मीदवार ऋषीकेश रमेश कराड ने अप्रत्याशित रूप से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है। हालांकि, भाजपा ने तुरंत स्थिति को संभालते हुए कराड की जगह सतीश अंबेकर को चुनावी मैदान में उतारकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है।

आज शाम तक सभी शेष उम्मीदवारों को चुनाव चिह्नों का आवंटन कर दिया जाएगा, जिसके बाद चुनावी मुकाबले की अंतिम तस्वीर साफ हो जाएगी। तांबाला और पानगांव की इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लातूर की जिला परिषद की लड़ाई अब केवल विकास के मुद्दों पर नहीं, बल्कि शह-मात के इस खेल में कौन कितना माहिर है, इस पर टिकी है। कांग्रेस के लिए यह हार से पहले एक बड़े मनोवैज्ञानिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।

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