हिंदी परीक्षा पर मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत का बड़ा फैसला ; जानें आखिर क्या होगा सरकार का अगला फैसला
महाराष्ट्र सरकार ने मराठी संगठनों और मनसे के तीव्र विरोध के बाद सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रस्तावित हिंदी भाषा परीक्षा स्थगित कर दी है। मुंबई, पुणे, नागपुर और छत्रपति संभाजीनगर में होने वाली परीक्षा अब समीक्षा के दायरे में है। सरकार 1976 से जारी इस व्यवस्था को स्थायी रूप से समाप्त करने पर भी विचार कर रही है।

महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री उदय सामंत
महाराष्ट्र में भाषा और पहचान की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। राज्य सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रस्तावित हिंदी भाषा परीक्षा को लेकर उठे तीव्र विरोध के बाद आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। महाराष्ट्र सरकार ने गैजेटेड और नॉन-गैजेटेड अधिकारियों तथा कर्मचारियों के लिए आयोजित की जाने वाली हिंदी भाषा परीक्षा को फिलहाल स्थगित कर दिया है। इतना ही नहीं, सरकार अब इस बात पर भी विचार कर रही है कि क्या भविष्य में ऐसी परीक्षा की कोई आवश्यकता बचती है या नहीं।
यह विवाद उस समय और गहरा गया जब महाराष्ट्र सरकार के भाषा संचालनालय ने 9 अप्रैल को एक परिपत्र जारी कर 28 जून को मुंबई, पुणे, नागपुर और छत्रपति संभाजीनगर सहित विभिन्न संभागीय केंद्रों पर हिंदी निम्न श्रेणी और उच्च श्रेणी की परीक्षाएं आयोजित करने की घोषणा की थी। सरकारी विभागों और कार्यालयों को निर्देश दिया गया था कि वे 20 मई तक कर्मचारियों के आवेदन विभागाध्यक्षों के माध्यम से जमा करें।
सूचना के अनुसार, निम्न श्रेणी की परीक्षा महाराष्ट्र राज्य बोर्ड की कक्षा 10 की “लोकभारती (द्वितीय भाषा)” हिंदी पाठ्यपुस्तक पर आधारित थी, जबकि उच्च श्रेणी की परीक्षा “कुमारभारती (प्रथम भाषा)” हिंदी पाठ्यक्रम के आधार पर आयोजित की जानी थी। जैसे ही यह आदेश सार्वजनिक हुआ, राज्य में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं।
मराठी भाषा संगठनों, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने इस कदम को मराठी भाषी राज्य में हिंदी को “पिछले दरवाजे से थोपने” की कोशिश करार दिया। मनसे नेताओं और मराठी भाषा कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि जब महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा मराठी है, तब सरकारी कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा का दबाव क्यों बनाया जा रहा है।
मनसे नेता संदीप देशपांडे ने सरकार पर दिल्ली नेतृत्व को खुश करने के लिए गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि 28 जून को परीक्षा आयोजित की गई, तो परीक्षा केंद्रों पर आंदोलन होगा और उसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। इस चेतावनी के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया।
बढ़ते विरोध और संभावित टकराव को देखते हुए मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने बुधवार को परीक्षा स्थगित करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार अब यह भी मूल्यांकन करेगी कि 2026 के वर्तमान दौर में इस तरह की हिंदी भाषा परीक्षा की वास्तव में कोई आवश्यकता है या नहीं। सामंत ने स्पष्ट किया कि यदि समीक्षा में यह पाया गया कि परीक्षा जरूरी नहीं है, तो इसे भविष्य में स्थायी रूप से समाप्त भी किया जा सकता है। भाषा विभाग के निदेशक अरुण गीते ने बताया कि मराठी भाषा विभाग ने भाषा संचालनालय द्वारा आयोजित हिंदी परीक्षा को रद्द करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा है। इस प्रस्ताव पर अंतिम नीति निर्णय जल्द लिया जा सकता है। तब तक सभी प्रस्तावित हिंदी परीक्षाएं स्थगित रहेंगी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी भाषा परीक्षा की यह व्यवस्था नई नहीं है। इसकी शुरुआत पुराने बॉम्बे राज्य के नियमों के तहत 1950 के दशक में हुई थी और 10 जून 1976 के सरकारी प्रस्ताव के बाद इसे औपचारिक रूप से जारी रखा गया। वर्तमान में यह परीक्षा हर वर्ष दो बार आयोजित की जाती रही है, जिसमें हजारों सरकारी कर्मचारी शामिल होते हैं। हालांकि अब बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं।
यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब महाराष्ट्र सरकार हाल ही में ऑटो रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने की दिशा में भी कदम उठा चुकी है। ऐसे में हिंदी परीक्षा का मुद्दा केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भाषा, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक संवेदनशीलता का बड़ा विषय बन गया है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
