जानें कौन है मधु दंडवते ? जिनके नाम से अब पहचाना जाएगा कोंकण रेलवे का सावंतवाड़ी स्टेशन
देश के पूर्व रेल और वित्त मंत्री प्रो. मधु दंडवते ने द्वितीय श्रेणी के रेल डिब्बों में गद्देदार सीटें लगवाकर आम यात्रियों का सफर आरामदायक बनाया था।

नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीडियाकर्मियों को संबोधित करते देश के पूर्व केंद्रीय वित्त एवं रेल मंत्री प्रो. मधु दंडवते।
Madhu Dandavate biography : भारतीय राजनीति के इतिहास में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचकर भी अपनी सादगी, ईमानदारी और शुचिता की महक से व्यवस्था को सुवासित करने वाले विरले ही राजनेता हुए हैं। एक ऐसे ही महान समाजवादी युगपुरुष, प्रख्यात परमाणु भौतिक विज्ञानी और देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री थे प्रो. मधु दंडवते। आज जब राजनीतिक गलियारों में शुचिता की बातें केवल बयानों तक सीमित दिखाई देती हैं, तब प्रो. मधु दंडवते का जीवन याद दिलाता है कि सत्ता में रहकर भी फकीरी को कैसे जिंदा रखा जाता है। देश के रेल और वित्त मंत्रालय जैसे भारी-भरकम विभागों को संभालने वाले इस दूरदर्शी जननेता को आज भी एक ऐसे युगप्रवर्तक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने भारतीय रेल के इतिहास में समाज के सबसे पिछड़े और आम यात्रियों के सफर को सम्मानजनक बनाकर करोड़ों लोगों के जीवन में सीधे क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी थी।
प्रो. मधु दंडवते के राजनीतिक सफर की शुरुआत की एक ऐसी दास्तान है जो आज की पीढ़ी को हैरान कर देने के लिए काफी है और जो उनके चरित्र की विशालता को बयां करती है। यह वाकया साल 1977 का है जब देश में आपातकाल के खात्मे के बाद नई सरकार का गठन हो रहा था और तमाम बड़े नेता मंत्रालयों के लिए लॉबिंग करने में व्यस्त थे। उस समय दिल्ली के वीपी हाउस के कमरा नंबर 403 में रहने वाले मधु दंडवते के दरवाजे पर जब एक आईएएस अधिकारी और वरिष्ठ नेताओं का दल एक बेहद जरूरी सरकारी संदेश लेकर पहुंचा, तो वहां का नजारा बिल्कुल अलग था। बैठक व्यवस्था में सन्नाटा था और बाथरुम से कपड़े धुलने की आवाज आ रही थी। दरअसल, प्रो. दंडवते खुद अपने हाथों से अपने कुर्ते धो रहे थे। जब उन्हें बताया गया कि उन्हें तुरंत प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडळ में शामिल होकर देश के रेल मंत्री पद की शपथ लेनी है, तो उन्होंने बेहद सहजता से कहा कि चुनाव की भागदौड़ में सारे कपड़े गंदे हो गए थे, इसलिए वे उन्हें साफ करने बैठ गए थे। इस फकीराना अंदाज वाले प्रोफेसर को तब शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि जिस विभाग की कमान उन्हें सौंपी जा रही है, वहां वे एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लेंगे जो देश के करोड़ों लोगों के लिए एक वरदान साबित होगा।
अहमदनगर के एक मध्यवर्गीय परिवार में 21 जनवरी 1924 को जन्मे मधु दंडवते बचपन से ही बेहद मेधावी थे। बॉम्बे के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से भौतिकी में विशिष्टता के साथ एमएससी करने के बाद खुद बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें सिद्धार्थ कॉलेज में भौतिकी विभाग के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया था। राजनीति में आने के बाद भी उनकी वैज्ञानिक सोच और मानवीय संवेदनाएं हमेशा आम आदमी से जुड़ी रहीं। रेल मंत्री बनते ही उन्होंने भ्रष्टाचार और वशिल्लाशाही पर नकेल कसते हुए रेलवे आरक्षण प्रणाली के कंप्यूटरीकरण की रूपरेखा तैयार की, जिसने बुकिंग क्लर्कों की मनमानी को पूरी तरह समाप्त कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने 5,000 किलोमीटर पुरानी जर्जर पटरियों को बदलने का ऐतिहासिक काम शुरू करवाया और कोंकण रेलवे के पहले चरण को मंजूरी दी। लेकिन उनका सबसे अविस्मरणीय और जन-हितैषी फैसला भारतीय ट्रेनों के द्वितीय श्रेणी के स्लीपर कोचों में लकड़ी के बेरहम बंकों की जगह दो इंच की गद्देदार फोम की सीटें लगाना था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक में इस फैसले को रेखांकित करते हुए लिखा है कि उन दो इंच के फोम ने संभवतः किसी भी अन्य भारतीय राजनेता की पहल की तुलना में भारत के करोड़ों गरीब यात्रियों को सबसे अधिक शारीरिक और मानसिक राहत पहुंचाई। प्रो. दंडवते का स्पष्ट मानना था कि उनका समाजवाद अमीरों को गिराने में नहीं, बल्कि गरीबों के स्तर को ऊंचा उठाने में विश्वास रखता है।
इसके बाद के वर्षों में उन्होंने वी. पी. सिंह की सरकार में देश के केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला और वहां भी उन्होंने देश की आर्थिक नीतियों को एक समतामूलक और जन-केंद्रित चेहरा दिया। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम को समाप्त कर सोने के व्यापार पर लगीं जटिल बंदिशों को खत्म किया, जिससे देश में इस कीमती धातु की कालाबाजारी पर रोक लगी। उनके द्वारा पेश किए गए बजट में छोटे किसानों, बुनकरों और कारीगरों के लिए कर्ज राहत की घोषणाएं शामिल थीं, जो डॉ. राममनोहर लोहिया के 'चौखम्बा राज' (गांव, जिला, प्रांत और केंद्र के विकेंद्रीकरण) के सपने को धरातल पर उतारने का एक गंभीर प्रयास था। उन्होंने काम के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने के लिए एक विधिक प्रस्ताव पर भी विचार शुरू किया था, हालांकि दिसंबर 1990 में सरकार के पतन के कारण वह कानूनी रूप नहीं ले सका। आपातकाल के काले दौर में 18 महीने तक बैंगलोर सेंट्रल जेल में बंद रहने के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी प्रमीला दंडवते (जो स्वयं भी मुंबई से सांसद रहीं) को करीब 200 पत्र लिखे थे, जो आज भी साहित्य, संगीत, कला और राजनीति के प्रति उनकी गहरी समझ का एक बेमिसाल दस्तावेज माने जाते हैं।
कैंसर जैसी गंभीर और दर्दनाक बीमारी से एक लंबी लड़ाई लड़ने के बाद 12 नवंबर 2005 को मुंबई के जसलोक अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में इस महान देशभक्त का निधन हो गया। लेकिन अपनी मृत्यु के बाद भी उन्होंने समाज के प्रति अपनी जवाबदेही को जिस तरह निभाया, वह आधुनिक भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है। प्रो. दंडवते ने अपने जीवनकाल में ही यह वसीयत की थी कि मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार या दहन न किया जाए, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को चिकित्सा अनुसंधान के लिए दान कर दिया जाए। उनकी इसी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके निधन के बाद उनके शरीर को मुंबई के जे. जे. अस्पताल को सौंप दिया गया। प्रो. मधु दंडवते का यह पूरा जीवनवृत्त और उनका अवसान आज की राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक आईना भी है और एक मार्गदर्शक प्रकाश भी, जो यह साबित करता है कि उच्च पदों पर रहकर भी पूरी तरह निष्कलंक, सादगी पसंद और आम जनता के प्रति पूरी तरह समर्पित कैसे रहा जा सकता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
