लातूर, प्रतिनिधि: "इंसानियत आज भी जिंदा है" इसका अहसास कराने वाली और हर किसी के दिल को छू लेने वाली एक बेहद भावुक और सनसनीखेज घटना सोमवार सुबह लातूर शहर के श्री औसा हनुमान देवस्थान परिसर में घटित हुई। यहां देवदर्शन के लिए आए एक श्रद्धालु को अचानक दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ा और वह कुछ ही पलों में बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इस अप्रत्याशित हादसे से मंदिर परिसर में अचानक अफरा-तफरी मच गई और वहां उपस्थित श्रद्धालुओं में भारी घबराहट व दहशत फैल गई। लेकिन, इस बेहद गंभीर और नाजुक समय में एक युवक ने जो अदम्य साहस और अद्वितीय सूझबूझ दिखाई, उसकी बदौलत उस अचेत व्यक्ति को अक्षरशः नया जीवन मिल गया।

घटनास्थल पर मौजूद स्थानीय युवक चैतन्य सदरे ने स्थिति की गंभीरता और आपातकाल को भांपते हुए बिना एक पल गंवाए तुरंत उस अचेत पड़े व्यक्ति की ओर दौड़ लगाई। उन्होंने सबसे पहले संबंधित व्यक्ति की नब्ज और सांसों की जांच की और स्थिति नाजुक देखते हुए तत्काल अपनी तरफ से सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिलेशन) देना शुरू कर दिया। अत्यंत संयम, सुदृढ़ आत्मविश्वास और सही चिकित्सकीय तकनीक का उपयोग करते हुए चैतन्य ने लगातार अपने प्रयास जारी रखे। कुछ मिनटों की बेहद कठिन और अथक मेहनत के बाद आखिरकार उस व्यक्ति के शरीर में हलचल हुई, उसने प्रतिक्रिया देना शुरू किया और उसकी स्थिति धीरे-धीरे स्थिर हो गई।

वहां उपस्थित चश्मदीद नागरिकों और प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि अगर उस नाजुक क्षण में चैतन्य सदरे ने यह अनुकरणीय धैर्य और त्वरित तत्परता नहीं दिखाई होती, तो एक बड़ा अनर्थ घटित हो सकता था। उनके द्वारा बिल्कुल सही समय पर दिए गए इस सीपीआर के कारण आज एक पूरे परिवार का मुख्य आधार स्तंभ सुरक्षित बच सका है। चैतन्य के इस अतुलनीय और साहसिक कार्य को देखकर वहां मौजूद अनेक लोगों ने भावुक होकर उन्हें "देवदूत" की उपमा दे डाली।

यह पूरी घटना "जाको राखे साइयां, मार सके न कोय" (देव तारी त्याला कोण मारी) की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करने वाली साबित हुई है। उपस्थित जनसमुदाय ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ जहां दर्शन के लिए आए श्रद्धालु पर अचानक प्राणघातक संकट आ पड़ा, वहीं दूसरी तरफ भगवान ने स्वयं चैतन्य सदरे के रूप में अपना मदती हाथ भेजकर उसकी जान बचाई।

चिकित्सकीय विशेषज्ञों और डॉक्टरों के अनुसार, हार्ट अटैक आने के बाद के शुरुआती शुरुआती कुछ मिनट मरीज के लिए बेहद कीमती और निर्णायक होते हैं। ऐसे आपातकालीन समय में यदि सही पद्धति से तत्काल सीपीआर दे दिया जाए, तो वह मरीज की जान बचाने में सबसे बड़ा संजीवन साबित हो सकता है। चैतन्य सदरे ने इस घटना के माध्यम से समाज के सामने इसका एक जीवंत और प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनके इस सराहनीय कदम ने समाज में सीपीआर प्रशिक्षण की आवश्यकता और उसके महत्व को एक बार फिर से पुरजोर तरीके से रेखांकित कर दिया है।

इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना के बाद से ही मंदिर परिसर सहित पूरे लातूर शहर में चैतन्य सदरे के इस देवतुल्य कार्य की चौतरफा सराहना और भारी प्रशंसा हो रही है। अपनी सामाजिक जिम्मेदारी, मानवता की प्रगाढ़ भावना और संकट के समय दूसरों की मदद के लिए दौड़ पड़ने की इस अद्भुत वृत्ति के कारण वे आज क्षेत्र के अनेक युवाओं के लिए एक महान प्रेरणास्रोत बन गए हैं। नागरिकों द्वारा उनके इस उल्लेखनीय और अनुकरणीय कार्य के लिए उन पर बधाइयों और अभिनंदन की लगातार बौछार की जा रही है, तथा समाज के सभी वर्गों द्वारा यह मत व्यक्त किया जा रहा है कि ऐसे युवाओं पर पूरे समाज को गर्व है।

जीवन और मृत्यु के इस भीषण संघर्ष में चंद मिनट कितने अमूल्य और जीवनदायी हो सकते हैं, इसका गहरा अहसास कराने वाली यह घटना वर्तमान में पूरे क्षेत्र में चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। यह घटना संपूर्ण समाज तक यह अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश पहुंचाने में सफल रही है कि "समय पर दिया गया सीपीआर और बढ़ाया गया मदद का हाथ किसी मरते हुए व्यक्ति को भी नवजीवन प्रदान कर सकता है।" चैतन्य सदरे के इस अनुकरणीय और मानवतावादी कार्य को समाज के सभी स्तरों से अत्यंत आदरपूर्वक सलाम किया जा रहा है।

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