लातूर शहर महानगरपालिका के अधिकारी और कर्मचारियों को नियमित वेतन नहीं मिलने का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। अपने हक के वेतन के लिए कर्मचारियों को सोमवार, 10 अगस्त को आंदोलन करना पड़ा। लातूर शहर महानगरपालिका अधिकारी-कर्मचारी संघटना की ओर से महानगरपालिका परिसर में पूरे दिन धरना आंदोलन किया गया। बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी आंदोलन में शामिल रहे, जिससे महानगरपालिका के दैनिक कामकाज पर भी असर दिखाई दिया।

महानगरपालिका के अधिकारी-कर्मचारियों को हर महीने वेतन देने के लिए करीब साढ़े पांच करोड़ रुपये की आवश्यकता होती है। हालांकि, महानगरपालिका को मिलने वाले जीएसटी अनुदान में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होने के कारण कर्मचारियों के नियमित वेतन का सवाल पैदा हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि महीनेभर सेवा देने के बावजूद वेतन के लिए आंदोलन करने की स्थिति क्यों बन रही है।

महानगरपालिका कर्मचारियों को हर महीने नियमित वेतन देने, सेवानिवृत्त कर्मचारियों का वेतन और अन्य देयक समय पर उपलब्ध कराने, नियमित वेतन के लिए आवश्यक जीएसटी अनुदान बढ़ाने तथा सातवें वेतन आयोग के अंतर की बकाया राशि का भुगतान करने सहित विभिन्न मांगें कर्मचारी संघटना ने की हैं।

इन मांगों को लेकर सोमवार को अधिकारी-कर्मचारी संघटना की ओर से धरना आंदोलन किया गया। अधिकारी और कर्मचारी पूरे दिन महानगरपालिका परिसर में आंदोलन पर बैठे रहे। इसके कारण विभिन्न विभागों के नियमित कामकाज पर भी असर पड़ा।

वेतन के मुद्दे को लेकर महानगरपालिका कर्मचारियों ने इससे पहले भी आंदोलन किया था। जून महीने में कर्मचारियों ने इन्हीं मांगों को लेकर आंदोलन और अनशन शुरू किया था। उस समय महानगरपालिका आयुक्त, उपायुक्त तथा स्थायी समिति सभापति ने कर्मचारियों का वेतन नियमित करने का आश्वासन दिया था। इसके बाद कर्मचारियों ने अपना अनशन वापस ले लिया था।

कर्मचारी संघटना का आरोप है कि इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। नियमित वेतन का प्रश्न कायम रहते हुए अब सातवें वेतन आयोग के अंतर की राशि मिलने का मुद्दा भी सामने आया है। इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है और बार-बार आंदोलन करने की नौबत आने पर नाराजगी व्यक्त की जा रही है।

महानगरपालिका कर्मचारियों के आंदोलन से शहर के नागरिकों के दैनिक कामकाज पर असर पड़ने की संभावना रहती है। दूसरी ओर, कर्मचारियों के लिए परिवार का खर्च चलाने के लिए नियमित वेतन जरूरी है। घर का खर्च, बच्चों की शिक्षा, कर्ज की किस्तें और चिकित्सा खर्च जैसी कई जिम्मेदारियां कर्मचारियों पर होती हैं। समय पर वेतन नहीं मिलने से उनके पारिवारिक आर्थिक नियोजन पर भी असर पड़ रहा है, ऐसी भावना कर्मचारियों ने व्यक्त की है।

महानगरपालिका की स्थापना के बाद से ही कर्मचारियों के वेतन का मुद्दा बार-बार सामने आता रहा है। ऐसे में इस समस्या का स्थायी समाधान कब होगा, यह सवाल भी उठ रहा है।

कर्मचारी संघटना का कहना है कि कर्मचारियों के वेतन का प्रश्न केवल महानगरपालिका प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए शासन स्तर से भी आवश्यक आर्थिक सहायता और अनुदान मिलना जरूरी है। हालांकि, शासन के समक्ष किस स्तर से और कितने प्रभावी तरीके से इस मुद्दे का पाठपुरावा किया जा रहा है, इसे लेकर भी कर्मचारियों में भ्रम की स्थिति है।

राज्य में भाजपा की सत्ता है, जबकि लातूर शहर महानगरपालिका में कांग्रेस की सत्ता है। ऐसे में महानगरपालिका और राज्य शासन, दोनों स्तरों पर समन्वय बनाकर कर्मचारियों के वेतन का प्रश्न हल करने की आवश्यकता को लेकर शहर में चर्चा शुरू है।

कर्मचारी संघटना ने शासन और महानगरपालिका प्रशासन से उनकी मांगों को गंभीरता से लेते हुए नियमित वेतन का प्रश्न स्थायी रूप से हल करने की मांग की है। मांगों की अनदेखी होने पर आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी संघटना के पदाधिकारियों ने दी है।

इस आंदोलन में लातूर महानगरपालिका अधिकारी-कर्मचारी संघटना के अध्यक्ष रवी कांबळे, उपाध्यक्ष बालाजी शिंदे, सचिव धोंडीबा सोनवणे, कोषाध्यक्ष अभिमन्यु पाटील सहित महानगरपालिका के अधिकारी और कर्मचारी बड़ी संख्या में शामिल हुए।

हर महीने शहर की सेवा करने वाले महानगरपालिका कर्मचारियों को अपने हक के वेतन के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है। ऐसे में नियमित वेतन, सेवानिवृत्त कर्मचारियों के मानधन और सातवें वेतन आयोग की बकाया राशि का मुद्दा अब केवल कर्मचारी संघटना की मांग नहीं रह गया है, बल्कि महानगरपालिका प्रशासन और शासन के सामने एक गंभीर चुनौती बन गया है।

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