लातूर: मराठवाड़ा के सूखे इतिहास का साक्षी रहा लातूर जिला एक बार फिर भीषण जलसंकट के मुहाने पर खड़ा है। भारतीय मौसम विभाग द्वारा राज्य में औसत से कम वर्षा के अनुमानों के बीच, जिले के जलभंडारों की वर्तमान स्थिति ने नागरिकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। लातूर जिले के बड़े, मध्यम और लघु श्रेणी के कुल १४५ जलपरियोजनाओं में अब मात्र ३२.०७ प्रतिशत उपयोगी जल ही शेष बचा है, जिसके कारण निकट भविष्य में पेयजल के साथ-साथ कृषि क्षेत्र के लिए भी गंभीर संकट उत्पन्न होने की आशंका प्रबल हो गई है।

जिले के १३५ लघु प्रकल्पों में वर्तमान में केवल २७.२३ प्रतिशत उपयोगी जलसंग्रह उपलब्ध है, जबकि आठ मध्यम परियोजनाओं की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, जिनमें कुल जलस्तर २१.७५ प्रतिशत पर सिमट गया है। लातूर शहर और जिले के एक बड़े हिस्से की जीवनरेखा मानी जाने वाली मांजरा परियोजना में अब मात्र २१.४९ प्रतिशत जल ही बचा है। वहीं, निम्न तेरणा परियोजना में जलस्तर ४३.२४ प्रतिशत दर्ज किया गया है।

मध्यम परियोजनाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। तावरजा परियोजना में ३३.०६ प्रतिशत, रेणा में २७.२२ प्रतिशत, व्हटी में १४.३८ प्रतिशत, तिरू में ११.३१ प्रतिशत, देवर्जन में १४.७५ प्रतिशत, साकोळ में २१.०१ प्रतिशत और घरणी परियोजना में २९.९० प्रतिशत उपयोगी जल बचा है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मसलगा मध्यम परियोजना पूरी तरह सूख चुकी है और वहां शून्य प्रतिशत जल दर्ज किया गया है।

जिले में पड़ रही प्रचंड गर्मी के कारण जलाशयों से जल का वाष्पीकरण तीव्र गति से हो रहा है, जिसका सीधा प्रभाव उपलब्ध जलभंडार पर पड़ रहा है। दूसरी ओर, कुओं और नलकूपों से बड़े पैमाने पर जल निकासी करके गन्ने की फसल को सींचा जा रहा है, जिससे भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर गया है। कई क्षेत्रों में कुओं का जलस्तर तल तक पहुंच चुका है। मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार, यदि मानसून के आगमन में देरी हुई या वर्षा सामान्य से कम रही, तो लातूर जिले पर गंभीर जलसंकट मंडराने की पूरी संभावना है। इसका सीधा असर न केवल पेयजल की उपलब्धता पर, बल्कि कृषि, पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए नागरिकों ने जिला प्रशासन से अविलंब जल संरक्षण हेतु व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की मांग की है। उपलब्ध जल का किफायती उपयोग, भूजल संवर्धन, जल-संरक्षण कार्यों को गति देना और पानी की बर्बादी पर नियंत्रण करना ही अब एकमात्र विकल्प शेष है।

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