कागल को राजनीति का विश्वविद्यालय माना जाता है। इस भूमि ने अनेक राजनीतिक नेताओं को जन्म दिया है और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं से लेकर विधानसभा तथा लोकसभा तक कागल की राजनीतिक परंपरा की छाप दिखाई देती है। वहीं, गोकुल दूध संघ की राजनीति में मुरगुड के पाटील परिवार ने अपना अलग प्रभाव और वर्चस्व स्थापित किया है।

गोकुल दूध संघ की राजनीति में रणजितसिंह पाटील ने कम उम्र में ही प्रवेश कर अपनी अलग पहचान बनाई। लगभग 35 वर्षों तक संचालक के रूप में कार्यरत रहे रणजितसिंह पाटील ने दो बार अध्यक्ष पद भी संभाला। उनकी राजनीतिक यात्रा में छोटे भाई तथा मुरगुड के पूर्व नगराध्यक्ष प्रवीणसिंह पाटील और उनके दिवंगत भाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

वर्तमान में रणजितसिंह और प्रवीणसिंह पाटील के समूह के पास 120 से अधिक दूध संस्थाओं का मजबूत नेटवर्क होने की चर्चा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से दोनों भाइयों के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चा भी होती रही है। विधानसभा चुनाव के दौरान प्रवीणसिंह पाटील ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ का समर्थन किया था, जबकि रणजितसिंह पाटील ने समरजीतसिंह घाटगे के पक्ष में भूमिका निभाई थी।

इस बीच, गोकुल की राजनीति में मंत्री हसन मुश्रीफ ने विधायक सतेज उर्फ बंटी पाटील के साथ समन्वय स्थापित करते हुए महाडिक गुट से गोकुल की सत्ता छीनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद राज्य में महायुति सरकार सत्ता में आई और हसन मुश्रीफ, समरजीतसिंह घाटगे तथा मुरगुड के पाटील बंधु सभी महायुति के दायरे में आ गए। इससे आगामी गोकुल चुनाव को लेकर राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा मिलती दिखाई दे रही है।

गोकुल चुनाव को महायुति ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। संघ की सत्ता महाआघाड़ी या कांग्रेस के हाथों में न जाए, इसके लिए जोरदार तैयारी की जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में मुरगुड के पाटील बंधुओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि क्या महायुति के हित में रणजितसिंह और प्रवीणसिंह पाटील एक बार फिर साथ आएंगे। जानकारों का मानना है कि यदि गोकुल में महायुति की सत्ता कायम रखनी है तो वर्षों तक संघ का नेतृत्व करने वाले पाटील बंधुओं को उचित राजनीतिक सम्मान और प्रतिनिधित्व देना आवश्यक होगा।

दूसरी ओर, विधायक सतेज उर्फ बंटी पाटील के नेतृत्व वाली आघाड़ी ने भी चुनाव के लिए मजबूत तैयारी शुरू कर दी है। उनके संगठन कौशल की झलक पहले कोल्हापुर महानगरपालिका की राजनीति में देखी जा चुकी है।

कुल मिलाकर, गोकुल की राजनीति का दूध फिलहाल धीमी आंच पर उबल रहा है। आगामी दिनों में कौन-से राजनीतिक समीकरण आकार लेते हैं, इसी पर चुनावी तस्वीर निर्भर करेगी। महायुति के नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी घटकों को साथ लेकर चलने और गोकुल की सत्ता बरकरार रखने की होगी।

Pratahkal Bureau

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