मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाने वाले अस्पतालों पर तुकाराम मुंढे का बड़ा वार!
महाराष्ट्र एफडीए कमिश्नर ने निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों को अपने ही परिसर के मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करने पर रोक लगा दी है। पढ़े पूरी रिपोर्ट

महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन के कमिश्नर तुकाराम मुंढे मुंबई में निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए जारी नए शासकीय नियमों की जानकारी देते हुए।
FDA action against private hospital monopoly : अस्पतालों में भर्ती मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर मोटी नफेखोरी करने वाले निजी और कॉरपोरेट हॉस्पिटल्स के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) विभाग ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। अपनी कड़क कार्यशैली के लिए देश भर में मशहूर एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने मरीजों को लूटने वाले चिकित्सा तंत्र के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। महाराष्ट्र में आए दिन ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि कई बड़े अस्पताल मरीजों को उनके ही परिसर के भीतर संचालित होने वाली अधिकृत फार्मेसी से दवाएं और चिकित्सा सामग्री खरीदने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मजबूर करते हैं। इस तानाशाही को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए कमिश्नर मुंढे ने एक बेहद महत्वपूर्ण और आधिकारिक आदेश जारी किया है, जिसने राज्य के निजी अस्पतालों में हड़कंप मचा दिया है।
इस क्रांतिकारी फैसले की आधिकारिक घोषणा करते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने साफ लफ्जों में कहा कि अस्पताल के भीतर बनी फार्मेसी से ही दवाएं खरीदना कानूनन कतई अनिवार्य नहीं है। कोई भी चिकित्सा संस्थान या अस्पताल प्रशासन किसी भी नागरिक को अपने छुपे हुए नियमों का हवाला देकर इस बात के लिए विवश नहीं कर सकता। उन्होंने कड़े लहजे में स्पष्ट किया कि दवाएं कहां से और किस दाम पर खरीदनी हैं, यह पूरी तरह से मरीज और उनके परिजनों का व्यक्तिगत विशेषाधिकार और बुनियादी नागरिक अधिकार है। अस्पतालों द्वारा खुद के मेडिकल स्टोर्स से ही महंगी ब्रांडेड दवाएं लेने का हठ करना पूरी तरह से अवैध और दंडात्मक कृत्य की श्रेणी में आता है।
तकनीकी और जमीनी हकीकत को देखें तो कई बड़े और निजी अस्पतालों ने अपनी मोनोपॉली (एकाधिकारशाही) बना रखी थी, जिसके कारण अस्पताल के बाहर खुले बाजार में मिलने वाली रियायती दर की दवाएं या सस्ते जेनेरिक विकल्प मरीजों तक नहीं पहुंच पाते थे। इस मनमानी लूट पर पूरी तरह से ब्रेक लगाते हुए नए शासकीय आदेश में यह अनिवार्य कर दिया गया है कि अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों को मरीज के इलाज के लिए जरूरी दवाओं का ओरिजिनल प्रिस्क्रिप्शन (पर्चा) उनके परिजनों को सौंपना ही होगा। परिजन उस पर्चे को लेकर अपनी सुविधानुसार और बजट के मुताबिक किसी भी बाह्य पंजीकृत मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे। यदि किसी विशिष्ट ब्रांड की दवा उपलब्ध न हो, तो उन्हें बाह्य स्टोर से उसके जेनेरिक सब्स्टीट्यूट चुनने की भी पूरी आजादी रहेगी।
इस आदेश के वैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं को स्पष्ट करते हुए तुकाराम मुंढे ने चेतावनी दी है कि यह फैसला केवल एक सामान्य सलाह नहीं है, बल्कि एक आधिकारिक सरकारी आदेश है जिसका उल्लंघन करने पर कानून के तहत बेहद कड़ा एक्शन लिया जाएगा। यदि कोई भी अस्पताल प्रशासन अब मरीजों या उनके तीमारदारों को अंदरूनी फार्मेसी से ही दवाएं लेने के लिए ब्लैकमेल या मजबूर करता है, तो आम नागरिक इसकी सीधी शिकायत खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) विभाग के पास दर्ज करा सकते हैं। विभाग ऐसी हर एक शिकायत को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए संबंधित अस्पताल के खिलाफ वैधानिक धाराओं के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।
मरीजों के अधिकारों की रक्षा करने वाला यह ऐतिहासिक निर्णय स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक बड़े सुधार के रूप में देखा जा रहा है। तुकाराम मुंढे के इस साहसिक कदम से न केवल अस्पतालों के कॉरपोरेट एकाधिकार और मनमानी नफेखोरी को करारा झटका लगा है, बल्कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे सर्वसामान्य और गरीब परिवारों की जेब पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी काफी कम होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की दिशा में लिया गया यह फैसला आने वाले समय में देश के उपभोक्ता अधिकारों और चिकित्सा नियमों के क्रियान्वयन के लिए एक क्रांतिकारी नजीर साबित होगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
