त-हाड़ी। सूखा केवल खेतों में फसलों के नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस वर्ष लंबे समय तक बारिश का साथ नहीं मिलने से धुले जिले के कई हिस्सों में फसलों की स्थिति खराब हो गई है। उत्पादन घटने की आशंका के बीच किसानों के हाथ में आने वाली रकम कम होगी, जिसका सीधा असर गांव-गांव की बाजार गतिविधियों और कारोबार पर पड़ने के संकेत हैं। ऐसे में इस वर्ष का सूखा केवल किसानों का नहीं, बल्कि पूरे गांव के आर्थिक चक्र का सवाल बन गया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र कृषि है। खरीफ मौसम में सोयाबीन, कपास, अरहर और मूंग जैसी फसलों से किसानों को मिलने वाली आय ही अगले कई महीनों के खर्च की योजना तय करती है। लेकिन बारिश की कमी से फसल उत्पादन घटा तो किसानों के हाथ में अपेक्षित पैसा नहीं रहेगा। इसका असर कर्ज चुकाने, घरेलू खर्च, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च, अगली खेती में निवेश और अन्य पारिवारिक जरूरतों पर पड़ेगा।

किसानों की आय के साथ खेतिहर मजदूरों के रोजगार पर भी सूखे का बड़ा असर पड़ता है। फसलों की वृद्धि रुकने से अंतरमशागत, निराई, कटाई और मड़ाई जैसे कामों की मात्रा कम हो जाती है। इससे रोजाना मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए रोजगार मिलना मुश्किल हो सकता है। रोजगार की तलाश में कई परिवारों को गांव से बाहर या शहरों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।

किसानों के हाथ में पैसा कम होने पर इसका असर गांव के किराना, कपड़े, कृषि सामग्री, हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, होटल और चाय-नाश्ते जैसे विभिन्न कारोबारों पर भी पड़ता है। किसान बड़ी खरीदारी के बजाय केवल जरूरी वस्तुओं पर खर्च को प्राथमिकता देते हैं। इससे छोटे व्यापारियों का कारोबार घटता है और उनका आर्थिक गणित भी बिगड़ने लगता है।

ट्रैक्टर, रोटावेटर, हार्वेस्टर, फसल छिड़काव मशीनें, वाहन चालक, डीजल विक्रेता, कृषि दवा विक्रेता तथा बीज-खाद विक्रेताओं की आय भी खेती से जुड़े कारोबार पर निर्भर रहती है। उत्पादन संकट में आने पर अगले मौसम के लिए किसानों की ओर से किया जाने वाला निवेश घटने की आशंका रहती है। इससे खेती के आसपास विकसित पूरा सेवा क्षेत्र धीमा पड़ सकता है।

खेती की उपज को बाजार तक पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर, पिकअप, ट्रक और अन्य वाहनों की बड़े स्तर पर जरूरत होती है। लेकिन उत्पादन कम होने पर परिवहन के चक्कर भी घट जाते हैं। इसका आर्थिक असर वाहन मालिकों, चालकों और हमालों से लेकर कृषि उपज मंडी के विभिन्न घटकों तक दिखाई दे सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसा एक घटक से दूसरे घटक तक घूमता रहता है। किसान को फसल बेचने से पैसा मिलता है और यही पैसा दुकानदारों, मजदूरों, वाहन चालकों, कृषि सेवा देने वालों तथा स्थानीय कारोबारियों तक पहुंचता है। इसलिए किसानों की आय में कमी अंततः पूरे गांव में पैसों के प्रवाह को प्रभावित करने वाली स्थिति बन जाती है।

आय घटने और खर्च कायम रहने पर ग्रामीण परिवारों को कर्ज का सहारा लेना पड़ सकता है। पहले से आर्थिक परेशानी झेल रहे परिवारों पर नए कर्ज का बोझ बढ़ने से स्थिति और गंभीर होने की आशंका है। दैनिक खर्च में कटौती, खरीदारी टालना और बड़े खर्चों से बचना स्थानीय बाजार में मांग को और कम कर सकता है।

सूखे की स्थिति में फसल नुकसान मुआवजा, फसल बीमा, कर्ज में राहत, रोजगार के अवसर, चारा-पानी की व्यवस्था और बिजली आपूर्ति जैसे उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन महत्वपूर्ण होगा। किसानों के हाथ में तत्काल पैसा पहुंचने पर इसका सकारात्मक असर गांव के अन्य आर्थिक घटकों पर भी पड़ता है।

सूखे की गंभीरता केवल सूखे खेतों से नहीं मापी जा सकती। गांव की बाजार गतिविधियों में आई मंदी, घटती मजदूरी और रुकी हुई खरीदारी से भी इसके प्रभाव का पता चलता है। इसलिए सूखा राहत की योजना बनाते समय किसानों के साथ खेतिहर मजदूरों, व्यापारियों, छोटे कारोबारियों और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

Pratahkal Newsroom

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