नाशिक जिला सरकारी अस्पताल के मानसोपचार विशेषज्ञ डॉ. नीलेश दत्तात्रय जेजुरकर की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पत्नी डॉ. मनिषा जेजुरकर को आत्महत्या के लिए प्रवृत्त करने के मामले में दाखिल उनकी अटकपूर्व जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दी है। इससे डॉ. जेजुरकर को गिरफ्तारी से मिला कानूनी संरक्षण नहीं मिल सका है और पुलिस की अगली कार्रवाई पर नजर है।

डॉ. नीलेश जेजुरकर के खिलाफ पत्नी को आत्महत्या के लिए प्रवृत्त करने के संदेह में मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में पहले जिला न्यायालय ने उनकी अटकपूर्व जमानत याचिका खारिज की थी। इसके बाद उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय का रुख किया, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई अटकपूर्व जमानत याचिका भी खारिज कर दी गई।

मुंबई उच्च न्यायालय में अटकपूर्व जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने मामले से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया था। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया था कि ५ मार्च २०२६ को चुलत बहन के विवाह समारोह में सभी के सामने अपमान की घटना हुई थी और उसके अगले ही दिन ६ मार्च को डॉ. मनिषा जेजुरकर ने गळफास लेकर आत्महत्या कर ली थी। दोनों घटनाओं के बीच बेहद कम समय होने की बात न्यायालय ने दर्ज की थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने प्रथमदृष्टया आत्महत्या के लिए प्रवृत्त करने के पहलू को नजरअंदाज नहीं किए जाने की बात कही थी। इसके अलावा घटनास्थल की परिस्थितियों और शवविच्छेदन से संबंधित पहलुओं में कुछ विसंगतियां होने की बात भी न्यायालय के संज्ञान में आई थी।

मामले के स्वरूप, उपलब्ध साक्ष्यों और जांच की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने अटकपूर्व जमानत देना उचित नहीं माना था। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां से भी डॉ. नीलेश जेजुरकर को राहत नहीं मिली।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अटकपूर्व जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद अब पुलिस की आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण हो गई है। जांच के दौरान डॉ. जेजुरकर से पूछताछ और आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है, इस पर नजर बनी हुई है।

Pratahkal Bureau

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