धुले - उबैद कादरी


होली का महापर्व और सांस्कृतिक ऊर्जा

होली की आहट के साथ खानदेश के आदिवासी अंचलों में 'भोंगर्या बाजार' का शानदार आगाज हुआ है। आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े समाज ने लोक-परंपराओं और उल्लास की अद्भुत मिसाल पेश की है। होली महज रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि वनवासी और आदिवासी समुदायों के लिए यह अपनी आदिम संस्कृति, जीवन-मूल्यों और उल्लास को अभिव्यक्त करने का सबसे बड़ा महापर्व है।

फाल्गुन महीने की शुरुआत के साथ ही पूरे खानदेश, विशेषकर धुले जिले के आदिवासी पट्टों में एक अलग ही सांस्कृतिक ऊर्जा का संचार होने लगता है। इसी ऊर्जा और सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत रूप शिरपुर तालुका के सुले गांव में आयोजित 'भोंगर्या बाजार' में देखने को मिला।

माटी की महक और लोक-कलाओं का संगम

  • शिरपुर तालुका के सुले और आंबा गांवों में मंगलवार का दिन वैसे तो साप्ताहिक बाजार का होता है, लेकिन होली से ठीक पहले यह दिन आदिवासी समुदाय के लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता।
  • सुबह की पहली किरण के साथ ही दूर-दराज के गांवों से सजी-धजी बैलगाड़ियों और अन्य वाहनों में सवार होकर आदिवासी युवक-युवतियों का जत्था बाजार में पहुंचने लगा।
  • उनके पहनावे में आदिवासी संस्कृति का मूल स्वरूप झलक रहा था—पारंपरिक वेशभूषा, कमर पर बंधी आकर्षक शालें और होठों पर सजी बांसुरी।

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मेल

ढोल-नगाड़ों का गगनभेदी नाद, बांसुरी के सुमधुर स्वर और अपने पारंपरिक नृत्यों में मग्न आदिवासी बांधव—यह दृश्य केवल एक हाट-बाजार का नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक महाकुंभ का था। उत्सवप्रिय आदिवासी समाज के लिए भोंगर्या बाजार अपनी खुशियों को सामूहिक रूप से साझा करने का एक सशक्त माध्यम है। युवा टोलियों ने बड़े ढोलों की लयबद्ध थाप पर जो ठेका पकड़ा, उसने पूरे माहौल को जादुई बना दिया।

"दिलचस्प बात यह रही कि युवा वर्ग अपनी कला में परंपरा और आधुनिकता का सुंदर तालमेल बिठाते दिखे; उन्होंने बांसुरी पर जहां एक ओर पारंपरिक लोकगीतों की धुनें छेड़ीं, वहीं कुछ लोकप्रिय फिल्मी गीतों को भी बांसुरी पर बड़ी सहजता से उतारकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।"

आर्थिक स्वावलंबन और खरीदारी

भोंगर्या बाजार केवल एक सांस्कृतिक मेला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। एक ही दिन में इस बाजार में लाखों रुपयों का व्यापार दर्ज किया गया। खरीदारी की मुख्य वस्तुएं रहीं:

  • विशेष पूजन सामग्री: भुने हुए चने (दालिया, फुटाने) और शक्कर के कंगन-हार।
  • नए वस्त्र और आभूषण।
  • घरेलू उपयोग की वस्तुएं।

आम साप्ताहिक बाजारों की तुलना में सुले गांव की सभी सड़कें तिल रखने की जगह न होने तक भीड़ से खचाखच भरी थीं।

विरासत का संरक्षण

आज जब वैश्वीकरण और आधुनिकता के प्रभाव में कई प्राचीन संस्कृतियां अपना वजूद खो रही हैं, तब सुले गांव का यह भोंगर्या बाजार एक सुखद अहसास दिलाता है। आदिवासी बांधवों ने अपनी मूल संस्कृति, अपने लोकनृत्य, वाद्ययंत्रों और अपनी जीवनशैली को जिस निष्ठा और जतन से सहेज कर रखा है, वह अनुकरणीय है।

सुले गांव से उठी भोंगर्या बाजार के इस उल्लास और ढोल की यह गूंज अब यहीं नहीं थमेगी। आने वाले पूरे सप्ताह तक शिरपुर तालुका के अलग-अलग गांवों और हाट-बाजारों में आदिवासी संस्कृति का यह रंगारंग कारवां यूं ही चलता रहेगा, और हमें हमारी आदिम जड़ों की समृद्धि का अहसास कराता रहेगा।

Pratahkal Newsroom

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