धुले। महाराष्ट्र के धुले शहर में लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव इस बार एक ऐतिहासिक करवट ले रहा है। जिस समाज को सदियों तक हाशिए पर रखा गया, जिसकी पहचान केवल उपेक्षा और तिरस्कार तक सीमित रही, वही समाज आज संविधान की शक्ति हाथ में लेकर सत्ता के सिंहासन को चुनौती देने निकल पड़ा है। धुले महानगरपालिका चुनाव के चुनावी रण में पहली बार 'शक्ति' का ऐसा संचार हुआ है जिसने स्थापित राजनीतिज्ञों की नींद उड़ा दी है। यह केवल मतों की लड़ाई नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का वह उद्घोष है, जहां एक 'ताली' की गूंज अब सत्ता के गलियारों में बदलाव की इबारत लिखने को बेताब है।

इस चुनावी महासंग्राम में शिवसेना (शिंदे गुट) की ओर से महामंडलेश्वर पार्वती नंदगिरी जोगी और उनकी शिष्या नीलू जोगी ने मैदान में उतरकर एक नई क्रांति की शुरुआत की है। शरीर और मन के द्वंद्व, परिवार के त्याग और सामाजिक बहिष्कार की कड़वाहट झेलने के बाद, यह समुदाय अब लोकतंत्र के मंदिर में प्रवेश करने के लिए तैयार है। धुले के प्रभाग क्रमांक 16 से शिवसेना उम्मीदवार के रूप में महामंडलेश्वर पार्वती जोगी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नीलू जोगी चुनाव लड़ रही हैं। यह चुनावी संघर्ष उन संकुचित मानसिकताओं के विरुद्ध एक युद्ध है, जो तृतीयपंथी समुदाय को केवल आशीर्वाद देने तक सीमित मानते थे। अब ये उम्मीदवार जनता की समस्याओं को सुलझाने और व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प के साथ मैदान में हैं।

पिछले 15 वर्षों से आध्यात्मिक गद्दी संभालने वाली और येल्लामा व कालुबाई मंदिर की पुजारी महामंडलेश्वर पार्वती जोगी की भूमिका अत्यंत स्पष्ट और भावुक कर देने वाली है। उनका कहना है कि उन्हें चुनाव जीतकर कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं बनानी है, क्योंकि न तो उनका परिवार है और न ही आगे की पीढ़ी जिसके लिए उन्हें संग्रह करना पड़े। वे भ्रष्टाचार और अवैध धंधों से मुक्त राजनीति का वादा कर रही हैं। शहर में कचरा प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और महिलाओं की सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों को उन्होंने अपना मुख्य एजेंडा बनाया है। वे संत गाडगे बाबा के विचारों को आत्मसात करते हुए कहती हैं कि 'देवता मंदिरों में नहीं, बल्कि इंसानों की सेवा में हैं।'

धुले के चुनावी रण में तृतीयपंथियों की यह 'ताली' अब पाखंडी व्यवस्था के खिलाफ एक कड़ा प्रहार साबित हो रही है। किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे झुके बिना, अन्याय के विरुद्ध खड़ी इन रणरागिनियों को जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। स्थापित नेताओं के लिए यह 'ताली' अब खतरे की घंटी बन चुकी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या धुले की राजनीति में यह भगवा ध्वज और बदलाव की यह ताली सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने में सफल होती है। यह चुनाव परिणाम तय करेगा कि क्या धुले का समाज समावेशी राजनीति के एक नए युग का स्वागत करने के लिए तैयार है।

Pratahkal Bureau

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