कोरापना के गणेशमोड़ स्थित ऐतिहासिक श्री दत्त मंदिर में बुधवार, 3 तारीख से शुरू हुए श्री दत्त जयंती उत्सव ने पूरे क्षेत्र में भक्ति और श्रद्धा का अनोखा वातावरण बना दिया है। साढ़े तीन दशकों से चली आ रही तीर्थ यात्रा की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, इस बार का तीन दिवसीय उत्सव विशेष धार्मिक आकर्षण और आध्यात्मिक कार्यक्रमों से परिपूर्ण है।

गुरुवार, 4 दिसंबर को श्री दत्त जयंती के पावन अवसर पर सुबह 5:30 बजे सामूहिक प्रार्थना के साथ दिन की शुरुआत होगी। इसके तुरंत बाद सुबह 11:30 बजे भव्य आरती और पूजा का आयोजन किया जाएगा। शाम को कार्यक्रमों का आध्यात्मिक रंग और गहराता जाएगा, जब पी. विट्ठल महाराज डाखरे का संध्या कीर्तन भक्तों को भक्ति रस में डुबो देगा। दहीहंडी कला से जुड़े स्वामी चैतन्य महाराज वढा द्वारा मंगल हस्त, शिक्षक विधायक सुधाकर अडबले का अभिनंदन समारोह और वास्तु विशारद बापूजी धोटे की उपस्थिति से उत्सव का गौरव और बढ़ेगा।

शाम 5:30 बजे सामुदायिक प्रार्थना, ध्यान और आरती से गणेशमोड़ की हवा भक्तिमय होगी। शुक्रवार, 5 दिसंबर को तड़के 5:30 बजे पूजा-पाठ शुरू होगा, जिसके बाद एच.बी.पी जाधव महाराज, गुरनुले महाराज, किनाके महाराज, मीनथ महाराज और भेंडाले महाराज द्वारा कीर्तन के माध्यम से प्रबोधन किया जाएगा। शाम 5:15 बजे सामुदायिक प्रार्थना के साथ उत्सव अपने आध्यात्मिक चरम की ओर बढ़ेगा। इस दौरान आयोजित भव्य भजन प्रतियोगिता विशेष आकर्षण का केंद्र बनने वाली है। आयोजकों ने अधिक से अधिक भक्तों से इस पवित्र आयोजन में उपस्थित होने की अपील की है।

श्री दत्त संस्थान के अध्यक्ष वसंत मडावी, उपाध्यक्ष शशिकांत अडकिने, सचिव डॉ. अरुण ठाकरे, सहसचिव दिलीप जेनेकर, कोषाध्यक्ष घनश्याम नांदेकर और ट्रस्टी देवाजी हुल्के, सुभाष वडस्कर, गजानन खमनकर, पुंडलिक उलमाले और विट्ठल पिंपलकर उत्सव को सफल बनाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

इस मंदिर की महत्ता भी कम नहीं है। वर्षों पहले, देवघाट नाले पर पुल की नींव खोदते समय मजदूरों को त्रिमुखी दत्त देवता की एक दुर्लभ मूर्ति मिली थी। इसके बाद स्थानीय लोगों की भागीदारी से मूर्ति को विधिवत स्थापित किया गया और समय के साथ तीर्थयात्रा की परंपरा भी शुरू हुई। आज यह स्थल महाराष्ट्र और तेलंगाना के हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जो हर वर्ष इस उत्सव में शामिल होने के लिए यहां उमड़ते हैं।

श्री दत्त जयंती उत्सव न केवल धार्मिक परंपरा का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी नई ऊर्जा देता है। गणेशमोड़ एक बार फिर भक्तिभाव की तरंगों से सराबोर है, और आने वाले दिनों में यहां श्रद्धालुओं के विशाल सैलाब की पूरी उम्मीद है।

Pratahkal Newsroom

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