धुले जिले के शिंदखेड़ा तालुका में बसे टेमलाय गांव ने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अनोखी और प्रेरणादायक परंपरा कायम की है। जब देश के अधिकांश हिस्सों में ग्राम पंचायत चुनाव गुटबाजी, धनबल, शराब वितरण और संघर्षों की छाया में गुजरते हैं, वहीं टेमलाय पिछले 45 वर्षों से बिना किसी चुनाव के, केवल आपसी सहमति से अपना सरपंच और पंचायत सदस्य चुनता आ रहा है। गांव के लोग चावड़ी पर एकत्र होकर अगले कार्यकाल के प्रतिनिधियों का नाम तय करते हैं और हर बार यह निर्णय सर्वसम्मति से ही होता है।

टेमलाय गांव की इस लोकतांत्रिक परंपरा की नींव करीब चार दशक पहले इसके प्रथम सरपंच 85 वर्षीय प्रतापसिंह अमरसिंह राजपूत ने रखी थी। जब 1980 में यह गांव निरगुडी ग्रुप ग्राम पंचायत से अलग होकर स्वतंत्र ग्राम पंचायत बना, तब भी यहां की एकता और व्यवस्था नहीं बदली। इससे पहले भी, जब दोनों गांव एक ही पंचायत का हिस्सा थे, तब उम्मीदवार सर्वसम्मति से चुने जाते थे। अलग पंचायत बनने के बाद जहां निरगुडी में चुनाव की परंपरा शुरू हुई, वहीं टेमलाय ने निर्विरोध चयन को अपनी पहचान बना लिया।

आज भी गांव के सातों पंचायत सदस्य और सरपंच बिना मतदान के ही तय किए जाते हैं। यही नहीं, गांव की सोसायटी के पदाधिकारी भी सहमति से चुने जाते हैं। गांव के बुजुर्ग और अनुभवी लोगों का कहना है कि जब आपसी मेल-जोल और विश्वास हो, तो चुनाव की जरूरत ही नहीं पड़ती।

टेमलाय का दूसरा अनोखा पहलू इसका अपराध-मुक्त इतिहास है। शिंदखेड़ा पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड बताते हैं कि गांव के खिलाफ आज तक एक भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। किसी भी प्रकार के विवाद को ग्रामीण पुलिस के बजाय आपस में बैठकर सुलझा लेते हैं। गांव की सामाजिक व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि जाति, धर्म या पंथ के आधार पर किसी प्रकार का मतभेद उत्पन्न नहीं होता।

व्यसनमुक्ति भी गांव की शांति का महत्वपूर्ण आधार है। यहां शराब की न तो कोई दुकान है और न ही किसी प्रकार का नशा सामाजिक रूप से स्वीकार्य है। मेहनतकश श्रमजीवी लोग होने के बावजूद गांव में नशे की प्रवृत्ति लगभग शून्य है, जिसने सामुदायिक अनुशासन को और मजबूत बनाया है।

गांव का प्राचीन हनुमान मंदिर आस्था और एकता का केंद्र है। वर्ष में एक बार यहां आयोजित होने वाली यात्रा गांव की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक है। आधुनिक सुविधाओं से थोड़ी दूरी होने के बावजूद टेमलाय प्रगति की ओर अग्रसर है। प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध है, जबकि उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को शिंदखेड़ा या निंभोरा जाना पड़ता है।

टेमलाय गांव ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामूहिक सहमति, आपसी सम्मान और सामाजिक अनुशासन से भी एक आदर्श प्रशासन संभव है। चार दशक से अधिक समय से कायम यह अनूठी परंपरा न केवल महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है।

Pratahkal Newsroom

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