गणेशमोड़ में उमड़ा भक्तों का सैलाब, श्री दत्त जयंती उत्सव की तीन दशक पुरानी परंपरा फिर हुई जीवंत
कोरापना–गणेशमोड़ के ऐतिहासिक श्री दत्त मंदिर में तीन दिवसीय श्री दत्त जयंती उत्सव धूमधाम से शुरू हुआ, जिसमें हजारों भक्तों ने भाग लिया। सामूहिक प्रार्थना, कीर्तन, भजन प्रतियोगिता और पूजा-अनुष्ठानों ने समारोह को भव्य रूप दिया। त्रिमुखी दत्त मूर्ति की ऐतिहासिक स्थापना के कारण यह स्थल वर्षों से एक प्रमुख तीर्थ स्थान बना हुआ है।

कोरापना–गणेशमोड़ के ऐतिहासिक श्री दत्त मंदिर में बुधवार, 3 दिसंबर से शुरू हुए श्री दत्त जयंती उत्सव ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। तीन दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में धार्मिक अनुष्ठानों और भक्ति कार्यक्रमों की भव्यता ने हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित किया, जिससे मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब गया।
श्री दत्त जयंती के शुभ अवसर पर गुरुवार की सुबह 5:30 बजे सामूहिक प्रार्थना के साथ दिन की शुरुआत हुई। इसके बाद 11:30 बजे विधिवत आरती और पूजा संपन्न हुई। शाम तक भक्तिरस से सराबोर कार्यक्रमों का सिलसिला जारी रहा, जिसमें पी. विट्ठल महाराज डाखरे का संध्या कीर्तन और दहीहंडी कला स्वामी चैतन्य महाराज वढा का मंगल हस्त प्रमुख आकर्षण रहे। इसी दिन शिक्षक विधायक सुधाकर अडबले का अभिनंदन समारोह और वास्तु विशारद बापूजी धोटे की उपस्थिति ने आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया। शाम 5:30 बजे सामुदायिक प्रार्थना, ध्यान और आरती के साथ दिन का समापन हुआ।
शुक्रवार, 5 दिसंबर को सुबह की पूजा के बाद एच.बी.पी. जाधव महाराज, गुरनुले महाराज, किनाके महाराज, मीनथ महाराज और भेंडाले महाराज द्वारा कीर्तन पर आधारित प्रवचनों ने भक्तों को अध्यात्म के गहरे स्वरूप से अवगत कराया। इसी दौरान आयोजित भव्य भजन प्रतियोगिता ने उत्सव में सांस्कृतिक जीवंतता जोड़ दी। आयोजकों ने अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से इस पवित्र आयोजन में उपस्थिति दर्ज कराने की अपील की। आयोजन की व्यवस्था श्री दत्त संस्थान के अध्यक्ष वसंत मडावी, उपाध्यक्ष शशिकांत अडकिने, सचिव डॉ. अरुण ठाकरे, संयुक्त सचिव दिलीप जेनेकर, कोषाध्यक्ष घनश्याम नांदेकर और ट्रस्टी मंडल ने संभाली।
इस मंदिर का इतिहास भी उतना ही गौरवशाली है जितना कि इसका वर्तमान उत्सव। वर्षों पहले देवघाट नाले पर पुल निर्माण के दौरान मजदूरों को त्रिमुखी दत्त देवता की मूर्ति मिली थी। स्थानीय लोगों ने मिलकर उसे विधिपूर्वक स्थापित किया और इसके बाद से यहां तीर्थयात्रा की परंपरा आरंभ हुई। लगभग साढ़े तीन दशकों से चली आ रही इस परंपरा ने आज महाराष्ट्र और तेलंगाना से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बना दिया है।
श्री दत्त जयंती उत्सव के दौरान उमड़ी भक्तों की भीड़ न सिर्फ आस्था की गहराई को दर्शाती है, बल्कि इस पवित्र स्थल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को भी नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम बनती है।
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