मिट्टी की आराधना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महापर्व: लातूर में सात सौ वर्षों से जीवित ‘वेळ अमावस्या’ की अनोखी परंपरा
लातूर जिले में मार्गशीर्ष अमावस्या पर मनाया जाने वाला ‘वेळ अमावस्या’ उत्सव सात सौ वर्षों पुरानी कृषि परंपरा का जीवंत प्रतीक है। पांडव पूजा, आंबील-उंडे का स्वाद, वनभोजन और मिट्टी की आराधना के माध्यम से यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सामाजिक समता और कृषि संस्कृति की अनूठी पहचान प्रस्तुत करता है।

लातूर:
महाराष्ट्र के लातूर जिले में मार्गशीर्ष अमावस्या का सूर्योदय होते ही शहर की रफ्तार थम जाती है और शिवारों में जीवन उमड़ पड़ता है। खेतों की ओर बढ़ते कदम, पांडवों की पूजा, आंबील-उंडे का पारंपरिक स्वाद और सामूहिक वनभोजन—इन सबके बीच लातूर की धरती पर ‘वेळ अमावस्या’ का उत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिट्टी, फसल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की जीवंत परंपरा है।
कृषि प्रधान भारत में अनेक पर्व खेती से जुड़े हैं, किंतु वेळ अमावस्या का स्वरूप विशिष्ट है। इस दिन किसान खेतों में कडबे की ‘कोपी’ बनाकर पूर्व दिशा की ओर मुख रखते हैं, जहां पांच पत्थरों के माध्यम से पंचमहाभूतों अथवा पांडवों की पूजा की जाती है। यहां किसी मूर्ति का स्थान नहीं, बल्कि मिट्टी, फसल और प्रकृति ही आराध्य मानी जाती है। लातूर और धाराशिव क्षेत्र में यह परंपरा लगभग सात सौ वर्षों से चली आ रही है। ऐतिहासिक रूप से निझाम शासन के प्रभाव के कारण यहां कन्नड़ संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है, जहां ‘वेल्ली’ शब्द का अर्थ फसल होता है। इसी से ‘वेळ अमावस्या’ नाम प्रचलित हुआ, जिसका मूल भाव प्रकृति के सही समय और संतुलन की उपासना है।
इस दिन बैलों को पूर्ण विश्राम दिया जाता है, घरों की चूल्हों से उठने वाला धुआं खेतों में कीट नियंत्रण में सहायक माना जाता है और पक्षी प्राकृतिक रूप से कीटों का भक्षण करते हैं। इस प्रकार यह पर्व आस्था के साथ-साथ अनुभवसिद्ध कृषि विज्ञान का भी प्रतीक बन जाता है। वनभोजन इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण होता है, जहां बाजरे की भाकरी, पालेभाजियों की भाजी और ज्वार के आटे की आंबील ठंड के मौसम में औषधीय आहार के रूप में ग्रहण की जाती है। जाति-पाति से परे सभी लोग एक साथ भोजन कर सामाजिक समता का संदेश देते हैं।
वेळ अमावस्या के अवसर पर लातूर शहर में सन्नाटा पसर जाता है, मानो अघोषित संचारबंदी हो, जबकि गांव और खेत लोगों से भर उठते हैं। बाजारों में कृषि सामग्री, अनाज और पशुधन से जुड़ी गतिविधियों में तेजी आती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। मराठवाड़ा के वरिष्ठ कवि इंद्रजित भालेराव की पंक्तियां—“काळ्या आईची कुशी, पिकं जोमाने डुलती…”—इस पर्व के मर्म को सजीव कर देती हैं।
समग्र रूप से देखें तो वेळ अमावस्या लातूर की कृषि संस्कृति का सांस्कृतिक दस्तावेज है, जो आधुनिकता की दौड़ में भी प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिकता और मिट्टी से जुड़े जीवन मूल्यों को जीवित रखे हुए है। यह पर्व न केवल अतीत की परंपरा को सहेजता है, बल्कि भविष्य के लिए प्रकृति-संवेदनशील जीवनशैली का संदेश भी देता है।
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