धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है, जीवन की सार्थकता धर्माचरण में : मुनि विवर्धनसागर
कोटा में मुनि विवर्धनसागर ने धर्म को मनुष्य जीवन की सार्थकता का आधार बताया और कर्मफल, सदाचरण व धर्माचरण का महत्व समझाया।

तस्वीर में रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी के श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में धर्मसभा का दृश्य दिख रहा है।
रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ (6 पिच्छी) के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा में मुनिश्री ने मनुष्य जीवन की सार्थकता और धर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि केवल जीवन जीना ही मनुष्य होने की पहचान नहीं है। धर्म ही वह तत्व है, जो मनुष्य को पशु से पृथक करता है।
मुनिश्री ने कहा कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों में भी पाई जाती हैं। पशु भी भोजन करता है, सोता है, भय का अनुभव करता है और अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों के अनुसार जीवन जीता है। ऐसे में मनुष्य जीवन की विशिष्टता क्या है, इस पर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि धर्म ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है और जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने द्रव्यसंग्रह ग्रंथ की गाथाओं के माध्यम से भगवान जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को सरल रूप में समझाया। उन्होंने गाथा-9 में वर्णित भोगत्व अधिकार का उल्लेख करते हुए कर्म और उसके फल के सिद्धांत को समझाया। उन्होंने कहा कि जीव अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं सकता। इस जन्म में किए गए कर्मों का फल यदि तत्काल दिखाई न दे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि कर्म समाप्त हो गया। कर्म का उदय होने पर जीव को उसके परिणामों का भोग करना ही पड़ता है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को छल-कपट, पाप और अनुचित आचरण से बचना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक कर्म अपने साथ परिणाम लेकर आता है।
अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा व मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा के प्रारंभ में चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं मुनिश्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य कुलदीप-सुनीता तथा रजत-तरुण जैन, पार्श्वनाथ निलय परिवार को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा में अध्यक्ष प्रकाश बज, पदम बड़ला, संरक्षक राजमल पाटौदी, कोषाध्यक्ष ताराचंद बडला, पारस आदित्य, पारस कासलीवाल, सुरेश देईवाले, बसन्ती लाल दोषी, धर्मचंद गोधा, टीकम पाटनी, रमेश हरसौरा, निर्मल काला, महेंद्र ठाई, लवेश जैन, संदीप बंसल और मनोज मित्तल उपस्थित रहे। धर्मसभा में मुनि विवर्धनसागर जी ने धर्माचरण को मनुष्य जीवन की सार्थकता का आधार बताते हुए कर्मों के परिणाम और सदाचरण के महत्व को रेखांकित किया।

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