कोटा। कुन्हाडी स्थित दिगंबर जैन निलय मंदिर में आयोजित विशेष धार्मिक आयोजन में गणिनी आर्यिका श्री 105 विभाश्री माताजी एवं आर्यिका श्री 105 विनयश्री माताजी (संघ सहित) ने श्रावकों को आत्मा और जीवन की गहन साधना के महत्व पर मार्गदर्शन दिया। इस अवसर पर माताजी ने स्पष्ट किया कि "आत्मा का प्रकाश ही सच्चा सूर्य है।"

माता विभाश्री ने अपने प्रवचन में देव गति, इन्द्रों की संख्या और कर्मों के आधार पर जीवों के जन्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देव गति में 32 इन्द्र होते हैं और प्रत्येक अपनी-अपनी लोक में निवास करते हैं, फिर भी यहां जन्म का निर्धारण भी कर्मों के आधार पर होता है। माता जी ने कहा कि मनुष्य केवल शुद्ध भावना, संयम और विवेकपूर्ण जीवन के माध्यम से ही देव गति को प्राप्त कर सकता है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने आत्मा के प्रकाश और जीवन के वास्तविक अर्थों पर भी बल दिया। माता जी के अनुसार, "जब तक हम अपने अज्ञान, राग-द्वेष और मोह को नहीं छोड़ते, तब तक आत्मा के सूर्य का प्रकाश हमें प्राप्त नहीं हो सकता। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और आत्म साधना से ही जीवन को वास्तविक अर्थों में प्रकाशित किया जा सकता है।"

इस दौरान निलय मंदिर में उपस्थित श्रावकों ने माता विभाश्री से अपने धर्म-संबंधित जिज्ञासाओं के समाधान प्राप्त किए। कार्यक्रम में सकल दिगंबर समाज के महामंत्री पदम बड़ला, रिद्धि–सिद्धि मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला सहित कई समाजिक और धार्मिक गणमान्य उपस्थित रहे। इसके अलावा, अशोक सांवाला, निर्मल अजमेरा, सुरेन्द्र पापडीवाल, सेवानिवृत्त न्यायाधीश जितेन्द्र कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

माता जी का यह प्रवचन न केवल धार्मिक आस्था को प्रगाढ़ करने वाला रहा, बल्कि जीवन में आत्मा की साधना और कर्मों के महत्व पर गंभीर संदेश भी देने वाला साबित हुआ। इस आयोजन ने जैन समाज के अनुयायियों को धर्म, ज्ञान और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

Pratahkal Bureau

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