उत्तम तप धर्म में वैराग्य और संयम से कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त
कोटा में उत्तम तप धर्म पर मुनि योगसागर और प्रणवसागर ने तप, वैराग्य, संयम और कर्मनिर्जरा के माध्यम से आत्मशुद्धि का संदेश दिया।

दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म के अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने तप धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं है, बल्कि तन और मन दोनों के कल्याण का माध्यम है। तप के माध्यम से आत्मा में वैराग्य, धैर्य, शांति और संयम के भाव जागृत होते हैं तथा कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है।
मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक कर्मनिर्जरा शुद्ध परिणामों से होती है। धर्मध्यान और शुक्लध्यान जैसे निर्मल परिणाम कर्मों की निर्जरा के कारण बनते हैं। वैराग्य और तप के माध्यम से आत्मा की विशुद्धि निरंतर बढ़ती जाती है। जैसे-जैसे वैराग्य बढ़ता है, वैसे-वैसे तप के प्रति रुचि बढ़ती जाती है और संसार की विषय-वासनाओं के प्रति आकर्षण कम होता जाता है।
तप के आध्यात्मिक स्वरूप की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा, “धैर्य जिसका पिता हो, क्षमा जिसकी माता हो, शांति जिसकी पत्नी हो, सत्य जिसका पुत्र हो, दया जिसकी बहन हो, संयम जिसका भ्राता हो, भू-शयन जिसका आभूषण हो और दिशाएं ही जिनके वस्त्र हों, ज्ञानामृत जिनका भोजन हो—ऐसे परिवार में आनंद ही आनंद है।”
मुनिश्री ने ‘परिवार’ शब्द की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि ‘परि’ अर्थात चारों ओर और ‘वर’ अर्थात श्रेष्ठता। जहां चारों ओर कर्मनिर्जरा और आत्मशुद्धि का वातावरण निर्मित हो जाता है, वहां तप का प्रादुर्भाव स्वाभाविक रूप से होता है। कर्म हमने स्वयं बांधे हैं, इसलिए उनकी निर्जरा के लिए तप और आत्मशुद्धि आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जीवन के संग्राम में वही विजय प्राप्त करता है, जो अपने उपादान के प्रति सदैव सजग रहता है। किसी भी कार्य को सोच-समझकर और विवेकपूर्वक करने से उसकी सफलता की दिशा प्रशस्त होती है। तपस्या के लिए केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक बल की आवश्यकता होती है। तप बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतरंग परिणामों की शुद्धि है।
मुनिश्री ने कहा कि तपस्या बुद्धिपूर्वक की जाती है। जब आत्मा के भीतर सहज रूप से धैर्य, शांति, संयम और वैराग्य के भाव प्रकट होने लगते हैं, तब साधक आत्मा के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति की ओर अग्रसर होता है। आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। धर्म ने तीर्थंकरों को जन्म नहीं दिया, बल्कि तीर्थंकरों ने धर्म के शाश्वत मार्ग को प्रकट कर भवसागर से पार होने का मार्ग दिखाया।
उन्होंने साधकों को प्रेरित करते हुए कहा कि निरंतर चिंतन करना चाहिए, “मैं अजर, अमर, अविनाशी और विशुद्ध आत्मा हूं।” आत्मबल को मजबूत बनाकर जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में ले जाना ही उत्तम तप धर्म की सार्थक अनुभूति है।
इसके बाद मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने उत्तम तप धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि जैन दर्शन में तप के बारह प्रकार बताए गए हैं, जिनमें छह बाह्य तप और छह अंतरंग तप हैं। तप के लिए ज्ञान, शांति और क्षमा जैसे गुणों का भीतर होना आवश्यक है। तप के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है और आत्मा मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होती है।
मुनिश्री ने कहा कि इच्छाओं का निरोध ही तप है। पंचेंद्रियां निरंतर विषयों की इच्छा करती रहती हैं और मनुष्य उनसे सुख प्राप्त करने के लिए बाहरी वस्तुओं की मांग करता रहता है। यदि व्यक्ति बड़ों, संतों और गुरुजनों के मार्गदर्शन का अनुसरण करे तो उसका कल्याण सहजता से हो सकता है।
उन्होंने कहा कि तप का उद्देश्य शरीर को मात्र कष्ट देना नहीं, बल्कि इच्छाओं का निरोध कर आत्मा की ओर लौटना है। साधु के लिए आवश्यक वस्तु को उचित समय पर श्रद्धापूर्वक उपलब्ध कराने वाला ही सच्चे अर्थों में वैयावृत्य करता है। तप, सेवा और संयम—तीनों आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने वाले साधन हैं।
मुनिश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि तप करो, कर्मों की निर्जरा करो और आत्मा में ऐसा दिव्य प्रकाश प्रकट करो, जो बाहरी प्रकाश से भी अधिक प्रभावशाली हो। उत्तम तप धर्म बाहरी सुखों से विमुख कर आत्मिक आनंद और मोक्षमार्ग की ओर ले जाता है।
धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन समस्त परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती एवं श्रावक श्रेष्ठी का पुण्यार्जन जिनवर्स यूथ ग्रुप द्वारा किया गया।
श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा परिवार, संजय लविश सी.ए., राजेश-सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार, सुशीला-विवेक ठोरा तथा अनिल-अनीता-दर्शन बरमुंडा परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन भी श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभाव से किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य जम्बू जी खजुरी को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती आशा, अभ्यांश, रीना श्रीमॉल को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। उत्तम तप धर्म के अवसर पर दिए गए प्रवचनों में तप को शरीर को कष्ट देने के बजाय इच्छाओं के निरोध, आत्मशुद्धि, संयम और कर्मनिर्जरा की साधना के रूप में समझाया गया।

Bhagvati Medatwal, Kota
नाम: भगवती मेड़तवाल
वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)
कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र
बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय
परिचय
भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।
