कोटा में गूँजी कृष्ण-सुदामा के पावन मिलन की गाथा: जब द्वारकाधीश ने अश्रुओं से धोए अपने सखा के पैर
कोटा के श्रीराम मंदिर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन श्री शिवदास जी महाराज ने कृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण वर्णन किया। मित्रता, त्याग और भक्ति की इस अमर गाथा के साथ व्यास पूजन का महत्व भी समझाया गया। जानें कैसे सुदामा के समर्पण ने द्वारकाधीश को द्रवित कर दिया और समाज को गुरु-शिष्य परंपरा का क्या संदेश मिला।

कोटा। धर्म और आध्यात्म की नगरी कोटा के जवाहर नगर स्थित श्रीराम मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन भक्ति और भावुकता का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने हर श्रद्धालु की आँखें नम कर दीं। कथा व्यास श्री शिवदास जी महाराज के मुखारविंद से जब कृष्ण-सुदामा के निस्वार्थ प्रेम और अटूट मित्रता का प्रसंग प्रवाहित हुआ, तो पूरा पंडाल 'जय श्री कृष्ण' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। महाराज ने इस पावन प्रसंग के माध्यम से समाज को मित्रता, भक्ति और विनय की वह त्रिवेणी सिखाई, जो कलयुग के इस दौर में मानवता के लिए सबसे बड़ी पूंजी है।
कथा के मर्म को समझाते हुए श्री शिवदास जी महाराज ने सुदामा जी के चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सुदामा केवल एक निर्धन ब्राह्मण नहीं, बल्कि संतोष और अटूट प्रभु-भक्ति के साक्षात प्रतीक थे। अत्यंत अभावों में जीवन व्यतीत करने और भिक्षाटन से परिवार का भरण-पोषण करने के बावजूद उनके मुख पर सदैव प्रभु का नाम रहता था। जब सुदामा जी अपनी पत्नी के आग्रह पर द्वारका पहुंचे, तो वहां वैभव के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण ने मर्यादाओं की समस्त सीमाएं लांघकर अपने मित्र का स्वागत किया। महाराज ने उस दृश्य का सजीव चित्रण किया जब स्वयं द्वारकाधीश ने अपने सिंहासन पर बिठाकर सुदामा के फटे-हाल पैरों को अपने आंसुओं से धोया। यह प्रसंग इस बात का जीवंत प्रमाण है कि ईश्वर केवल भक्त का भाव और समर्पण देखते हैं, उसकी संपत्ति या सामाजिक वैभव नहीं।
इस आध्यात्मिक सभा में महाराज ने केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित न रहकर समाज सुधारकों और महान विभूतियों के योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद, मीराबाई, नरसी जी और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार इन महान आत्माओं ने सनातन धर्म और समाज को एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में वंश परंपराओं का निर्वहन और व्यासपीठ के मर्यादापूर्ण नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहें।
सप्तम दिवस का एक अन्य महत्वपूर्ण आकर्षण 'व्यास पूजन' रहा। गुरु-शिष्य परंपरा की महानता पर प्रकाश डालते हुए श्री शिवदास जी महाराज ने बताया कि व्यास पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस ज्ञान और मार्गदर्शन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास के सम्मान में किए जाने वाले इस पूजन की महत्ता बताते हुए उन्होंने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार को प्रत्येक हिंदू का परम कर्तव्य बताया। कथा के समापन पर हुई महाआरती में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा, जो इस बात का प्रतीक है कि आज भी भक्ति और सच्ची मित्रता के आदर्श समाज के हृदय में जीवित हैं।

Pratahkal Bureau
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