जयपुर के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में गूंजी मालवा की महक: किशन प्रणय के उपन्यास ‘मालवा डायरी’ का भव्य लोकार्पण
जयपुर के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में कोटा के युवा साहित्यकार किशन प्रणय के नए उपन्यास ‘मालवा डायरी’ का भव्य लोकार्पण हुआ। ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन और राजस्थान फोरम द्वारा आयोजित इस समारोह में लोकेश कुमार साहिल और बाबुषा कोहली सहित कई दिग्गजों ने शिरकत की। यह लेख मालवा के लोकजीवन और संस्कृति को समेटे इस उपन्यास की साहित्यिक यात्रा और आयोजन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।

जयपुर। गुलाबी नगरी के सांस्कृतिक गलियारों में स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब उस समय मालवा की माटी की खुशबू से सराबोर हो उठा, जब ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के प्रतिष्ठित साहित्यिक कार्यक्रम ‘सम्मुख’ के तहत युवा साहित्यकार किशन प्रणय के नवीनतम उपन्यास ‘मालवा डायरी’ का भव्य लोकार्पण किया गया। राजस्थान फोरम के विशिष्ट सहयोग से आयोजित इस गरिमामय समारोह ने न केवल कोटा के इस होनहार रचनाकार की लेखनी को सराहा, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य में क्षेत्रीय विमर्श की बढ़ती धमक को भी रेखांकित किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्य जगत के दिग्गज हस्ताक्षरों की उपस्थिति में हुआ, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार लोकेश कुमार साहिल, ईश्वरदत्त, कामना राजावत, अभिलाषा पारिक, राव शिवपाल सिंह और प्रमोद शर्मा जैसे प्रबुद्ध मनीषियों ने अपनी गरिमामय उपस्थिति से मंच की शोभा बढ़ाई। साहित्य की इस महफिल में शब्दों का जादू उस समय और गहरा गया जब कवयित्री बाबुषा कोहली और श्वेता मिश्रा ने अपनी भावपूर्ण कविताओं का पाठ किया, जिससे पूरा परिसर काव्यमयी ऊर्जा से भर उठा।
वक्ताओं ने ‘मालवा डायरी’ की साहित्यिक मीमांसा करते हुए इसे हिंदी उपन्यास विधा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि करार दिया। चर्चा के दौरान यह तथ्य उभरकर आया कि यह उपन्यास महज एक कहानी नहीं, बल्कि मालवा अंचल के भूगोल, वहां के लोकजीवन की विविधता और आम जनमानस के अंतहीन संघर्षों का एक प्रामाणिक सामाजिक दस्तावेज है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि किशन प्रणय ने अपनी कलम से क्षेत्रीय जीवन की सहजता और श्रमशील समाज की पीड़ा को जिस संवेदनशीलता के साथ उकेरा है, वह पाठक को मानवीय संबंधों की एक नई गहराई से साक्षात्कार कराता है।
लेखक किशन प्रणय, जो हिंदी, राजस्थानी और मालवी साहित्य के क्षेत्र में एक सक्रिय और सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उभर रहे हैं, उनके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता जमीनी यथार्थ और सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता रही है। ‘मालवा डायरी’ में उन्होंने मालवा की संस्कृति को एक जीवंत अनुभव की तरह पिरोया है। समारोह के समापन सत्र में हुए खुले संवाद ने पाठकों और समीक्षकों को उपन्यास के विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा करने का अवसर दिया। उपस्थित विद्वानों ने एकमत से स्वीकार किया कि यह कृति युवा हिंदी कथा-लेखन की यात्रा में एक मील का पत्थर साबित होगी, जो आने वाले समय में साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाएगी।

Pratahkal Bureau
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