कोटा में गुरुमा 105 स्वस्ति भूषण माताजी के पावन सानिध्य एवं दिव्य आशीर्वाद में स्टेशन दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित सिद्धचक्र मंडल विधान के तृतीय दिवस का शुभारंभ गुरुवार को भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। श्रद्धालुओं ने शांति धारा, अभिषेक एवं जिनवाणी स्तवन के साथ भगवान जिनेंद्र की आराधना कर विश्व कल्याण एवं आत्मशुद्धि की मंगल कामना की।

विधान के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं तथा इन्द्र-इन्द्राणियों ने सहभागिता निभाई। सभी ने सामूहिक रूप से 512 अर्घ समर्पित कर अष्ट सिद्धियों के अधिष्ठाता सिद्ध परमेष्ठी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की। पूरे मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार, भक्ति संगीत और जयघोष से आध्यात्मिक वातावरण निर्मित रहा।

अपने प्रवचन में गुरुमा 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य यदि दूसरों की निंदा और आलोचना करने के बजाय अपनी कमियों को स्वीकार कर उनका सुधार करे, तो जीवन की अनेक समस्याओं का स्वतः समाधान हो सकता है। उन्होंने कहा कि आत्मावलोकन ही आत्मोन्नति का प्रथम कदम है।

गुरुमा ने प्रतिक्रमण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रतिक्रमण मन, वचन और कर्म की शुद्धि का सर्वोत्तम साधन है। धर्म की दृष्टि से यह पापों का क्षय करता है तथा व्यक्ति को आंतरिक रूप से हल्का और निर्मल बनाता है। उन्होंने कहा कि नियमित प्रतिक्रमण से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन प्रतिक्रमण का अभ्यास करना चाहिए।

संध्याकालीन कार्यक्रमों में सिद्ध चक्र विधान मंडल की आरती, मुनिसुब्रतनाथ भगवान का चालीसा, स्तोत्र, चैत्य भक्ति, समाधी मरण भक्ति तथा प्रश्नोत्तरी का आयोजन भी हुआ। श्रद्धालुओं की सक्रिय सहभागिता के बीच संपन्न हुए इन धार्मिक आयोजनों ने पूरे कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा से ओत-प्रोत बना दिया।

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